चरक संहिता रोग,दोषप्रधानता, दूष्य, भेद , स्रोतस, चिकित्सा योग का संक्षिप्त सारिणी परीक्षा उपयोगी

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चरक संहिता रोग दोष दूष्य स्रोतस चिकित्सा सारिणी Charaka Samhita disease table dosha dushya srotas

यह प्रश्न आयुर्वेद (चरक संहिता) से संबंधित है। मेडिकल लाइब्रेरी में आयुर्वेद ग्रंथ की जाँच करते हुए सीधे विस्तृत सारिणी तैयार करता हूँ।
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चरक संहिता के प्रमुख रोगों की परीक्षा-उपयोगी सारिणी नीचे प्रस्तुत है। यह आयुर्वेद के चिकित्सास्थान एवं निदानस्थान के आधार पर तैयार की गई है:

चरक संहिता - परीक्षा उपयोगी सारिणी

रोग, दोषप्रधानता, दूष्य, भेद, स्रोतस एवं चिकित्सायोग


1. ज्वर (Ci.3)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, वातपित्तज, वातकफज, पित्तकफज, सन्निपातज, आगन्तुज
दूष्यरस, रक्त
भेद8 प्रकार (अष्टविध ज्वर)
स्रोतसरसवहस्रोतस, रक्तवहस्रोतस
चिकित्सायोगलंघन, पाचन, स्वेदन; वातज-स्नेहन+बस्ति; पित्तज-विरेचन, चन्दन, उशीर; कफज-वमन, त्रिकटु; सन्निपात-सुदर्शन चूर्ण, गिलोय, महासुदर्शन

2. रक्तपित्त (Ci.4)

विषयविवरण
दोषप्रधानतापित्तप्रधान (वात/कफ अनुबन्ध)
दूष्यरक्त, पित्त
भेदऊर्ध्वग, अधोग, उभयतोग
स्रोतसरक्तवहस्रोतस, प्राणवहस्रोतस
चिकित्सायोगविरेचन, वमन (ऊर्ध्वग में नहीं); वासा, द्राक्षा, शर्करा, प्रवाल, शतावरी; द्राक्षारिष्ट

3. गुल्म (Ci.5)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, रक्तज
दूष्यरस, रक्त, मांस, मेद
भेद5 प्रकार (पञ्चविध गुल्म)
स्रोतसरसवहस्रोतस, आर्तवस्रोतस
चिकित्सायोगवातज-हिंग्वाष्टक, त्रिफला; पित्तज-शतावरी घृत; कफज-त्रिकटु, पुनर्नवा; शोधन (वमन-विरेचन)

4. प्रमेह (Ci.6)

विषयविवरण
दोषप्रधानताकफप्रधान (सभी दोष), मेदोज
दूष्यमेद, मांस, क्लेद, शुक्र, शोणित, वसा, मज्जा, रस, ओजस्
भेद20 प्रकार (कफज-10, पित्तज-6, वातज-4)
स्रोतसमेदोवहस्रोतस, मूत्रवहस्रोतस, क्लेदवहस्रोतस
चिकित्सायोगस्थूल-शोधन चिकित्सा; कृश-बृंहण; शिलाजीत, हरिद्रा, आमलकी, निम्ब, गुडूची; चन्द्रप्रभावटी

5. कुष्ठ (Ci.7)

विषयविवरण
दोषप्रधानतात्रिदोषज (वात-पित्त-कफ)
दूष्यत्वक्, रक्त, मांस, लसीका (आम्बुवहस्रोतस)
भेदमहाकुष्ठ-7, क्षुद्रकुष्ठ-11 = कुल 18 प्रकार
स्रोतसरक्तवहस्रोतस, त्वग्वहस्रोतस
चिकित्सायोगपंचकर्म (वमन-विरेचन प्रधान); खदिरारिष्ट, गन्धकरसायन, आरोग्यवर्धिनी, निम्ब घृत

6. राजयक्ष्मा (क्षय) (Ci.8)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावात-कफप्रधान
दूष्यरस, रक्त, मांस, शुक्र, ओजस्
भेदएकरूप (किन्तु सप्तधातुक्षय)
स्रोतसरसवहस्रोतस, प्राणवहस्रोतस
चिकित्सायोगबृंहण, स्नेहन; च्यवनप्राश, अश्वगन्धा, शतावरी, द्राक्षा, वंशलोचन; सितोपलादि चूर्ण

7. उन्माद (Ci.9)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, आगन्तुज
दूष्यमनस् (रज-तम), मज्जा
भेद5 प्रकार
स्रोतसमनोवहस्रोतस, मज्जावहस्रोतस
चिकित्सायोगशोधन (घृतपान+वमन+विरेचन+नस्य+शिरोबस्ति); ब्राह्मी, सारस्वत चूर्ण, पञ्चगव्य घृत

8. अपस्मार (Ci.10)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज
दूष्यमनस्, मज्जा, हृदय
भेद4 प्रकार
स्रोतसमनोवहस्रोतस, मज्जावहस्रोतस
चिकित्सायोगवचा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी; नस्य (वचातैल); सर्पगन्धा; पञ्चगव्य घृत

9. मूढगर्भ / प्रसवजन्य रोग (Ci.15)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातप्रधान
दूष्यआर्तव, गर्भाशय
स्रोतसआर्तवस्रोतस
चिकित्सायोगस्नेहन-स्वेदन; शतपुष्पा, दशमूल क्वाथ

10. अर्श (Ci.14)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, सहज
दूष्यत्वक्, मांस, मेद
भेद6 प्रकार (सहज, वातज, पित्तज, कफज, रक्तज, सन्निपातज)
स्रोतसपुरीषवहस्रोतस, अन्नवहस्रोतस
चिकित्सायोगभेषज-क्षार-अग्निकर्म-शस्त्र; कुटजारिष्ट, अभयारिष्ट, चित्रकहरीतकी

11. ग्रहणी (Ci.15)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, घाटिका (सन्निपातज)
दूष्यरस, अग्नि
भेद4 प्रकार
स्रोतसअन्नवहस्रोतस, आम्बुवहस्रोतस
चिकित्सायोगदीपन-पाचन; कुटज, मोचरस, बिल्व; ग्रहणीकपाट रस

12. पाण्डु रोग (Ci.16)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, मृद्भक्षणज
दूष्यरक्त, रस
भेद5 प्रकार
स्रोतसरक्तवहस्रोतस, रसवहस्रोतस
चिकित्सायोगविरेचन; लौह भस्म, नवायस लौह, पुनर्नवा मण्डूर, त्रिफला

13. शोथ / शोफ (Ci.12)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, क्षयज, विषज
दूष्यरस, मांस, मेद
भेद6 प्रकार
स्रोतसरसवहस्रोतस, मांसवहस्रोतस
चिकित्सायोगपुनर्नवा, वरुण, दशमूल; शोधन; पुनर्नवासव

14. उदर रोग (Ci.13)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, प्लीहोदर, बद्धोदर, आगन्तुज, क्षतज
दूष्यरस, मेद, क्लेद
भेद8 प्रकार
स्रोतसअन्नवहस्रोतस, मेदोवहस्रोतस
चिकित्सायोगपुनर्नवा मण्डूर, रोहितकारिष्ट, गोमूत्र; शोधन

15. हिक्का-श्वास (Ci.17)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावात-कफप्रधान
दूष्यप्राण, उदान वायु
भेदहिक्का-5, श्वास-5
स्रोतसप्राणवहस्रोतस
चिकित्सायोगशिरीष, कण्टकारी, द्राक्षा; स्वासकुठार रस, कनकासव

16. कास (Ci.18)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, क्षतज, क्षयज
दूष्यप्राण वायु, रस
भेद5 प्रकार
स्रोतसप्राणवहस्रोतस, अन्नवहस्रोतस
चिकित्सायोगसितोपलादि, तालिसादि चूर्ण; वासारिष्ट; द्राक्षा, पिप्पली, मधु

17. छर्दि (Ci.20)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, त्रिदोषज, आगन्तुज
दूष्यरस, अन्न
भेद5 प्रकार
स्रोतसअन्नवहस्रोतस
चिकित्सायोगशुण्ठी, धान्यक, एला; शंखभस्म; अनुलोमन

18. तृष्णा रोग (Ci.22)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, क्षयज, आमज
दूष्यरस, क्लेद
भेद6 प्रकार
स्रोतसआम्बुवहस्रोतस
चिकित्सायोगउशीर, चन्दन, धान्यक, प्रियंगु; धान्वन्तर घृत

19. वातरक्त (Ci.29)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावात-रक्त (वात+पित्त)
दूष्यरक्त, वात
भेदउत्तान (superficial), गम्भीर (deep)
स्रोतसरक्तवहस्रोतस
चिकित्सायोगस्नेहपान, विरेचन; गुग्गुलु, गुडूची, महातिक्त घृत, कैशोर गुग्गुलु

20. योनि रोग / प्रदर (Ci.30)

विषयविवरण
दोषप्रधानतावातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज
दूष्यआर्तव, रक्त
भेद4+रक्तप्रदर
स्रोतसआर्तवस्रोतस
चिकित्सायोगलोध्र, अशोक, प्रियंगु; अशोकारिष्ट, बोलपर्पटी

संक्षिप्त दोष-स्रोतस सम्बन्ध (Quick Reference)

दोषप्रधान स्रोतस
वातपुरीषवहस्रोतस, अस्थिवहस्रोतस, प्राणवहस्रोतस
पित्तरक्तवहस्रोतस, स्वेदवहस्रोतस
कफरसवहस्रोतस, मांसवहस्रोतस, मेदोवहस्रोतस

सामान्य चिकित्सा सिद्धान्त (Chikitsa Sutra)

दोषप्रधान चिकित्सा
वातजस्नेहन → स्वेदन → बस्ति
पित्तजविरेचन → तिक्त-मधुर द्रव्य
कफजवमन → रूक्षण → दीपन-पाचन
सन्निपातजशोधन (क्रम से) → शमन
आगन्तुजकारण निवारण → दोष के अनुसार

परीक्षा टिप्स:
  • प्रमेह के 20 भेद (कफज-10, पित्तज-6, वातज-4) याद रखें
  • कुष्ठ के 18 भेद (महाकुष्ठ-7 + क्षुद्रकुष्ठ-11)
  • ज्वर में लंघन परम औषध (च.चि.३)
  • गुल्म में एकमात्र रक्तज गुल्म स्त्रियों में होता है
  • वातरक्त का साध्य-असाध्य: उत्तान-साध्य, गम्भीर-कष्टसाध्य
  • राजयक्ष्मा को रोगराज कहते हैं
यह सारिणी चरक संहिता के चिकित्सास्थान एवं निदानस्थान पर आधारित है। BAMS/MD आयुर्वेद परीक्षाओं के लिए उपयोगी है।

चरक निदान स्थान की व्याधियों का संक्षिप्त वर्णन

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चरक निदान स्थान 8 अध्याय व्याधि निदान पञ्चनिदान ज्वर गुल्म प्रमेह कुष्ठ

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Charaka Nidana Sthana 8 chapters diseases nidana panchaka BAMS summary

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Charaka Nidana Sthana 8 chapters diseases nidana panchaka hetu purvarupa rupa upashaya samprapti

अब पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो गई है। विस्तृत उत्तर प्रस्तुत है:

चरक निदानस्थान - व्याधियों का संक्षिप्त वर्णन

निदानस्थान का परिचय

चरक संहिता का द्वितीय स्थान है। इसमें 8 अध्याय और 247 श्लोक हैं। निदानस्थान का मूल उद्देश्य है - रोग की सम्यक् पहचान।

निदान पञ्चक (रोग ज्ञान के पाँच उपाय)

क्र.घटकअर्थ
1हेतु (निदान)रोग के कारण
2पूर्वरूपप्रोड्रोमल/प्रारम्भिक लक्षण
3रूपप्रकट/मुख्य लक्षण
4उपशयअनुकूल आहार-विहार-औषध
5सम्प्राप्तिरोगोत्पत्ति का क्रम (Pathogenesis)
निदानस्थान के प्रत्येक अध्याय में इन्हीं पञ्च घटकों का वर्णन है।

अध्याय 1 - ज्वर निदान (Jwara Nidana)

विषयविवरण
परिचयनिदानस्थान का प्रथम एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अध्याय; निदान पञ्चक का परिचय भी यहीं
हेतुवात-पित्त-कफ प्रकोप, आगन्तु कारण (शोक, भय, क्रोध आदि)
दूष्यरस धातु, आमाशय
भेद8 प्रकार - वातज, पित्तज, कफज, वातपित्त, वातकफ, पित्तकफ, सन्निपातज, आगन्तुज
पूर्वरूपअंगमर्द, अरोचक, शिरोगुरुत्व, जृम्भा
रूपदेह-दाह, शिरोवेदना, अरोचक, अंगमर्द, तृष्णा
सम्प्राप्तिआम → रसवहस्रोतस अवरोध → स्वेदवहस्रोतस अवरोध → ज्वर
उपशयलंघन (सर्वप्रथम उपाय), पाचन, अग्निदीपन
विशेष"ज्वर सर्वरोगाणां राजा" - सभी रोगों में प्रमुख

अध्याय 2 - रक्तपित्त निदान (Raktapitta Nidana)

विषयविवरण
परिचयरक्तधातु सम्बन्धी विकृतियाँ; रक्त + पित्त का संयुक्त विकार
हेतुउष्ण-तीक्ष्ण-अम्ल-लवण आहार अधिक सेवन; क्रोध, धूपसेवन
दूष्यरक्त, पित्त
भेदऊर्ध्वग, अधोग, उभयतोग
पूर्वरूपकफस्त्राव, दाह, मुखरस परिवर्तन
रूपमुख, नाक, गुदा, योनि से रक्तस्राव
सम्प्राप्तिपित्त → रक्त दूषण → स्रोतस क्षरण → रक्तस्राव
उपशयशीत स्पर्श, मधुर-तिक्त आहार
विशेषऊर्ध्वग-रक्तपित्त में वमन वर्जित

अध्याय 3 - गुल्म निदान (Gulma Nidana)

विषयविवरण
परिचयउदरस्थ ग्रन्थि/गाँठ; Modern - Abdominal tumors/masses
हेतुवेगधारण, चिन्ता, शोक, अजीर्ण, गर्भपात उपरान्त
दूष्यरस, रक्त, मेद, आर्तव
भेद5 प्रकार - वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, रक्तज (स्त्रियों में)
पूर्वरूपअफारा, मलावरोध, उदर-अस्वस्थता
रूपउदर में अनियमित आकार की गाँठ, वेदना, विबन्ध
सम्प्राप्तिवात प्रकोप → आमाशय/पक्वाशय क्षेत्र में संचय → गुल्म
विशेषरक्तज गुल्म केवल स्त्रियों में; वातज गुल्म सर्वाधिक कष्टसाध्य

अध्याय 4 - प्रमेह निदान (Prameha Nidana)

विषयविवरण
परिचयमूत्र से सम्बन्धित 20 प्रकार के विकार; Modern - Diabetes mellitus एवं अन्य
हेतुअव्यायाम, स्वप्नशीलता, दधि-मांस-मिष्ठान्न अति सेवन
दूष्यमेद, मांस, क्लेद, शुक्र, रक्त, वसा, मज्जा, रस, ओजस् (10 दूष्य)
भेद20 प्रकार - कफज 10 (साध्य), पित्तज 6 (कृच्छ्रसाध्य), वातज 4 (असाध्य)
पूर्वरूपहाथ-पैर की दाह, मुखमाधुर्य, अतिस्वेद, शरीरगन्ध
रूपबहुमूत्र, मूत्र में विभिन्न अशुद्धि (प्रकारानुसार)
सम्प्राप्तिकफ-मेद → मूत्रवहस्रोतस अवरोध → प्रमेह
विशेषमधुमेह = वातज/क्षुद्रमेह → असाध्य; शर्करामेह = Diabetes mellitus
प्रमेह के 20 भेद (परीक्षा हेतु अनिवार्य):
दोषप्रमेह के प्रकारकुल
कफजउदकमेह, इक्षुरसमेह, सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह, शुक्लमेह, शुक्तमेह, शीतमेह, सिकतामेह, शनैर्मेह, आलालमेह10
पित्तजक्षारमेह, कालमेह, नीलमेह, हरितमेह, रक्तमेह, मञ्जिष्ठामेह6
वातजवसामेह, मज्जामेह, हस्तिमेह, मधुमेह4

अध्याय 5 - कुष्ठ निदान (Kushtha Nidana)

विषयविवरण
परिचयत्वचारोग; Modern - Skin diseases (Leprosy, Psoriasis आदि)
हेतुविरुद्ध आहार, पाप कर्म, गुरु-स्निग्ध आहार, वेगावरोध
दूष्य7 दूष्य - त्वक् (5 परतें), रक्त, मांस, लसीका
भेद18 प्रकार - महाकुष्ठ 7 + क्षुद्रकुष्ठ 11
पूर्वरूपअतिस्वेद, अस्वेद, त्वक्वर्ण परिवर्तन, कण्डू
रूपत्वक्विकृति, वर्ण-स्पर्श-रोम-स्वेद में असामान्यता
सम्प्राप्तित्रिदोष + 4 दूष्य (त्वक्-रक्त-मांस-लसीका) → कुष्ठ
विशेषकुष्ठ की उत्पत्ति में पाप कर्म का उल्लेख; दोषानुसार 18 भेद
18 कुष्ठ:
वर्गभेद
महाकुष्ठ (7)कापालम्, औदुम्बरम्, मण्डलम्, ऋक्षजिह्वम्, पुण्डरीकम्, सिध्मम्, कालम्
क्षुद्रकुष्ठ (11)एककुष्ठ, चर्मदलम्, किटिभम्, विपादिका, अलसम्, दद्रु, चर्मखुजम्, पामा, विस्फोट, शतारु, विचर्चिका

अध्याय 6 - शोष निदान (Shosha Nidana / राजयक्ष्मा)

विषयविवरण
परिचयधातुक्षय जन्य रोग; Modern - Tuberculosis + Wasting syndrome
अन्य नामराजयक्ष्मा ("रोगराज"), क्षय, यक्ष्मा
हेतु4 कारण - साहस (overexertion), संधारण (वेगावरोध), क्षय (ह्रास), विषम अशन
दूष्यरस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, ओजस्
पूर्वरूपअरोचक, वर्णभेद, स्वरभेद, खाँसी प्रारम्भ
रूप11 लक्षण (एकादश रूप) - त्रिकशूल, पार्श्वशूल, ज्वर, कास, श्वास, रक्तष्ठीवन, स्वरभेद, दौर्बल्य, अतिसार, अरोचक, शोफ
सम्प्राप्तिओजस् क्षय → सप्तधातुक्षय → यक्ष्मा
विशेष"यक्ष्मा रोगाणां राजा" - रोगराज

अध्याय 7 - उन्माद निदान (Unmada Nidana)

विषयविवरण
परिचयमानसिक विकार; Modern - Psychosis/Mania/Schizophrenia
हेतुनिज (दोषज - दोषप्रकोप) एवं आगन्तु (देव, पितर, भूत, गन्धर्व आदि आवेश)
दूष्यमनस् (रज-तम), मज्जा, हृदय
भेद5 प्रकार - वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, आगन्तुज
पूर्वरूपअस्थिरता, चित्तभ्रम, स्वप्नदोष, प्रेमोन्माद
रूपमनो-बुद्धि-चित्त-स्मृति-भक्ति-शील-चेष्टा-आचार में विकृति
सम्प्राप्तिदोष → मनोवह + मज्जावहस्रोतस दूषण → हृदय-मस्तिष्क विकृति
उन्माद के 5 भेदों के विशिष्ट लक्षण:
भेदविशेष लक्षण
वातजअनियमित चेष्टा, गाना-हँसना-रोना बेकार में
पित्तजक्रोध, उग्रता, अस्त्र ग्रहण की इच्छा
कफजमौन, एकांत, भोजन में अनिच्छा
सन्निपातजतीनों के मिश्र लक्षण; असाध्य
आगन्तुजअचानक उत्पत्ति, विशेष देवादि लक्षण

अध्याय 8 - अपस्मार निदान (Apasmara Nidana)

विषयविवरण
परिचयचेतनानाश + आक्षेप; Modern - Epilepsy/Seizure disorders
शाब्दिक अर्थअप = हानि, स्मर = स्मृति → स्मृतिनाश
हेतुदोषप्रकोप → मनोवहस्रोतस → हृदय आवरण
दूष्यमनस्, मज्जा
भेद4 प्रकार - वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज
पूर्वरूपभय, प्रतीकाराभास, आँखें फड़कना, हृदयस्पन्दन
रूपस्मृतिभ्रंश, मूर्च्छा, आक्षेप (convulsions), फेन, दन्तकटकट
उपशयचेतना वापसी पर - विस्मरण
अपस्मार के 4 भेदों में अन्तर:
भेदवेग की अवधिलक्षण विशेष
वातजथोड़ी देरकृष्णवर्ण दृष्टि, फेन, वायु शब्द
पित्तजकमपीत दर्शन, दाह, स्वेद
कफजअधिक समयश्वेत दृष्टि, कफ, अल्पचेष्टा
सन्निपातजसर्वाधिकमिश्र लक्षण; असाध्य

निदानस्थान के 8 अध्यायों का सारांश (Quick Reference)

अ.अध्यायव्याधिदूष्यभेदModern Correlation
1ज्वर निदानFeverरस8Pyrexia
2रक्तपित्त निदानBleeding disorderरक्त+पित्त3Haemorrhagic conditions
3गुल्म निदानAbdominal massरस, रक्त, मेद5Abdominal tumors
4प्रमेह निदानUrinary disorders10 दूष्य20Diabetes, Urinary diseases
5कुष्ठ निदानSkin diseases7 दूष्य18Leprosy, Psoriasis
6शोष निदानWasting/TBरस-ओजस् तक-Tuberculosis
7उन्माद निदानPsychosisमनस्+मज्जा5Mental disorders
8अपस्मार निदानEpilepsyमनस्+मज्जा4Epilepsy/Seizures

परीक्षा उपयोगी विशेष बिन्दु

1. निदानस्थान में कुल 8 अध्याय, 247 श्लोक
2. प्रमेह में सर्वाधिक भेद = 20; कुष्ठ में = 18
3. रोगराज = राजयक्ष्मा; रोगों का राजा = ज्वर
4. रक्तज गुल्म = केवल स्त्रियों में
5. सन्निपातज उन्माद एवं सन्निपातज अपस्मार = असाध्य
6. निदानस्थान में निदानार्थकर रोग की अवधारणा = एक रोग दूसरे का कारण
7. उपशय-अनुपशय परीक्षा = रोग एवं चिकित्सा की परीक्षा एक साथ
8. अपस्मार का शाब्दिक अर्थ = स्मृतिनाश (अप + स्मर)
9. प्रमेह में 10 दूष्य - यह अन्य किसी रोग में इतने नहीं
10. कुष्ठ में 7 दूष्य = 5 त्वक् परतें + रक्त + मांस + लसीका

चरक चिकित्सास्थान की प्रमुख व्याधियों का संक्षिप्त वर्णन जानें

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चरक चिकित्सास्थान 30 अध्याय व्याधि चिकित्सा BAMS Charaka Chikitsa Sthana all chapters summary

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सभी 30 अध्यायों की सूची प्राप्त हो गई। अब विस्तृत एवं परीक्षा-उपयोगी वर्णन प्रस्तुत है:

चरक चिकित्सास्थान - प्रमुख व्याधियों का संक्षिप्त वर्णन

चिकित्सास्थान का परिचय

चरक संहिता का षष्ठ स्थान (6th Section) 30 अध्याय | आयुर्वेद का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चिकित्सात्मक खण्ड उद्देश्य: स्वास्थ्यरक्षण + रोगनिवारण
चिकित्सा का सामान्य क्रम:
लंघन/बृंहण → स्नेहन/रूक्षण → स्वेदन/स्तम्भन → शोधन → शमन

सम्पूर्ण 30 अध्यायों की सूची

अ.अध्याय नामव्याधिModern Correlation
1रसायन चिकित्साRejuvenation therapyAnti-aging
2वाजीकरण चिकित्साAphrodisiac therapySexual health
3ज्वर चिकित्साFeverPyrexia
4रक्तपित्त चिकित्साBleeding disordersHaemorrhage
5गुल्म चिकित्साAbdominal massAbdominal tumors
6प्रमेह चिकित्साUrinary/metabolic disorderDiabetes mellitus
7कुष्ठ चिकित्साSkin diseasesDermatology
8राजयक्ष्मा चिकित्साWasting diseaseTuberculosis
9उन्माद चिकित्साMental disordersPsychosis
10अपस्मार चिकित्साEpilepsySeizure disorders
11क्षतक्षीण चिकित्साChest injury + emaciationTrauma + TB
12श्वयथु चिकित्साOedema/SwellingOedema
13उदर चिकित्साAbdominal diseasesAscites/Liver disease
14अर्श चिकित्साPiles/HaemorrhoidsHaemorrhoids
15ग्रहणी चिकित्साMalabsorptionIBS/Sprue
16पाण्डु चिकित्साAnaemia/JaundiceAnaemia
17हिक्का-श्वास चिकित्साHiccup + DyspnoeaHiccup/Asthma
18कास चिकित्साCoughCough/Bronchitis
19अतिसार चिकित्साDiarrhoeaDiarrhoea
20छर्दि चिकित्साVomitingVomiting
21विसर्प चिकित्साHerpes/spreading skinHerpes/Cellulitis
22तृष्णा चिकित्साExcessive thirstPolydipsia
23विष चिकित्साPoisoningToxicology
24मदात्यय चिकित्साAlcoholismAlcohol disorders
25द्विव्रणीय चिकित्साTwo types of woundsWound management
26त्रिमर्मीय चिकित्साThree vital organs diseasesHead/Heart/Bladder
27उरुस्तम्भ चिकित्साThigh stiffnessMuscle rigidity
28वातव्याधि चिकित्साVata disordersNeurological diseases
29वातरक्त चिकित्साGoutGout
30योनिव्यापत् चिकित्साGynaecological disordersGynaecology

अध्याय 1 - रसायन चिकित्सा (Rasayana)

विषयविवरण
परिभाषारसादीन् धातून् रसायति इति = धातुओं को पोषित करना
उद्देश्यदीर्घायु, स्मृति, आरोग्य, यौवन, प्रभा, बल, वर्ण
भेदकुटीप्रावेशिक (indoor), वातातपिक (outdoor)
प्रमुख रसायनअभया (हरीतकी), आमलकी, च्यवनप्राश, ब्राह्मी, अश्वगन्धा
विशेषच्यवनप्राश = श्रेष्ठ रसायन; ब्राह्मी = मेध्य रसायन
मेध्य रसायन (4)मण्डूकपर्णी, यष्टिमधु, गुडूची, शंखपुष्पी

अध्याय 2 - वाजीकरण चिकित्सा (Vajikarana)

विषयविवरण
परिभाषावाजी = घोड़ा; वाजी जैसी शक्ति देना
उद्देश्यशुक्र वृद्धि, सन्तानोत्पत्ति, यौनशक्ति
पात्र16-70 वर्ष, इन्द्रियजित, स्वस्थ, स्त्रीसहित
प्रमुख योगअश्वगन्धा, शतावरी, मुसली, क्षीरबला, कपिकच्छु
विशेषवाजीकरण = अष्टाङ्ग आयुर्वेद का एक अंग

अध्याय 3 - ज्वर चिकित्सा (Jwara Chikitsa)

विषयविवरण
चिकित्सा सूत्र"लंघनं परमौषधम्" (ज्वर में लंघन सर्वश्रेष्ठ)
सामान्य क्रमलंघन → पाचन → स्वेदन → शमन
वातज ज्वरस्नेहन + बस्ति; स्वेदन
पित्तज ज्वरविरेचन; चन्दन, उशीर, पित्तपापड़ा
कफज ज्वरवमन; त्रिकटु, गुडूची
सन्निपात ज्वरसुदर्शन चूर्ण, गिलोय, महासुदर्शन
आगन्तु ज्वरकारण निवारण + दोषानुसार चिकित्सा
विषम ज्वरअर्धावभेदक (हर 2 दिन), तृतीयक (हर 3 दिन) = मलेरिया
प्रमुख योगगिलोय सत्व, संशमनी वटी, तिक्तक घृत

अध्याय 4 - रक्तपित्त चिकित्सा

विषयविवरण
चिकित्सा सूत्रपित्त शमन + रक्त स्तम्भन
ऊर्ध्वगविरेचन (अधोमार्ग से निकास); वमन वर्जित
अधोगवमन (ऊर्ध्वमार्ग से निकास)
प्रमुख औषधवासा, द्राक्षा, शर्करा, प्रवाल पिष्टी, शतावरी
योगवासारिष्ट, द्राक्षासव, बोलपर्पटी

अध्याय 5 - गुल्म चिकित्सा

विषयविवरण
वातजस्नेहन + हिंग्वाष्टक, दशमूल
पित्तजविरेचन + शतावरी घृत
कफजवमन + त्रिकटु, पुनर्नवा
रक्तजविरेचन + रक्तस्तम्भन
सन्निपातजकठिन; शोधन क्रम से
योगकांचनार गुग्गुलु, हिंग्वाष्टक चूर्ण

अध्याय 6 - प्रमेह चिकित्सा

विषयविवरण
मुख्य सिद्धान्तस्थूल प्रमेही → शोधन; कृश प्रमेही → बृंहण
कफज (साध्य)शोधन + दीपन-पाचन
पित्तज (कृच्छ्रसाध्य)विरेचन + तिक्त-कषाय द्रव्य
वातज (असाध्य)स्नेहन + बस्ति; केवल पालन
प्रमुख औषधशिलाजीत, हरिद्रा, आमलकी, निम्ब, मेथी, गुडूची
योगचन्द्रप्रभावटी, शिलाजीत वटी, वसन्त कुसुमाकर रस
आहारयव, जौ, करेला, जामुन, मेथी विशेष उपयोगी

अध्याय 7 - कुष्ठ चिकित्सा

विषयविवरण
प्रथम चिकित्सापंचकर्म - वमन + विरेचन प्रधान
रक्तमोक्षणजलौका (leech therapy) उत्तम
प्रमुख औषधखदिर, निम्ब, हरिद्रा, बाकुची, सारिवा
योगखदिरारिष्ट, आरोग्यवर्धिनी वटी, गन्धकरसायन, निम्बाद्य घृत
बाकुची (Psoralea)श्वेतकुष्ठ (vitiligo) में विशेष
विशेषमहाकुष्ठ = कष्टसाध्य; सन्निपातज = असाध्य

अध्याय 8 - राजयक्ष्मा चिकित्सा

विषयविवरण
चिकित्सा सूत्रबृंहण + पोषण (क्षीण धातु की पूर्ति)
प्रमुख औषधच्यवनप्राश, अश्वगन्धा, शतावरी, बला, वंशलोचन, अभ्रक भस्म
योगसितोपलादि चूर्ण, वसावलेह, अगस्त्यहरीतकी
आहारदुग्ध, घृत, मांस रस विशेष
शोधन वर्जितअत्यन्त क्षीण में शोधन नहीं

अध्याय 9 - उन्माद चिकित्सा

विषयविवरण
चिकित्साघृतपान → वमन → विरेचन → नस्य → शिरोबस्ति
वातजस्नेहन + बस्ति; ब्राह्मी घृत
पित्तजविरेचन; कल्याण घृत
कफजवमन; सारस्वत चूर्ण
आगन्तुजधूप, मन्त्र, भैषज्य
योगपञ्चगव्य घृत, सारस्वत चूर्ण, ब्राह्मी वटी

अध्याय 10 - अपस्मार चिकित्सा

विषयविवरण
चिकित्साशोधन (नस्य + वमन + विरेचन) → शमन
प्रमुख औषधवचा, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, सर्पगन्धा
योगपञ्चगव्य घृत, वचातैल नस्य
विशेषवेग के समय → आश्वासन + धूम

अध्याय 11 - क्षतक्षीण चिकित्सा

विषयविवरण
परिभाषाक्षत = वक्षःक्षत (chest injury); क्षीण = धातुक्षय
चिकित्साबृंहण + रोपण + रसायन
योगअश्वगन्धा, बला, शतावरी, यष्टिमधु; क्षीर-घृत

अध्याय 12 - श्वयथु (शोफ) चिकित्सा

विषयविवरण
भेदवातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, क्षयज, विषज
वातजस्नेहन + बस्ति
पित्तजविरेचन + शीत उपाय
कफजवमन + रूक्षण
योगपुनर्नवा, वरुण, शिग्रु; पुनर्नवासव

अध्याय 13 - उदर चिकित्सा

विषयविवरण
भेद8 प्रकार - वातोदर, पित्तोदर, कफोदर, सन्निपात, प्लीहोदर, बद्धोदर, आगन्तुज, क्षतज
सामान्य चिकित्सागोमूत्र + पुनर्नवा + विरेचन
प्लीहोदररोहितकारिष्ट, प्लीहारि लौह
जलोदर (Ascites)गोमूत्र + पुनर्नवा मण्डूर
विशेष"उदर में लंघन अहितकर" - बृंहण प्रधान

अध्याय 14 - अर्श चिकित्सा (Haemorrhoids)

विषयविवरण
चिकित्सा चतुष्टयभेषज - क्षार - अग्निकर्म - शस्त्र
भेषजकुटज, चित्रक, हरीतकी, नागकेसर
क्षाररसाञ्जन, यवक्षार (chemical cautery)
अग्निकर्मशलाका से दाह
शस्त्रशस्त्रकर्म (surgical excision)
योगअभयारिष्ट, कुटजारिष्ट, चित्रकहरीतकी

अध्याय 15 - ग्रहणी चिकित्सा (IBS/Sprue)

विषयविवरण
चिकित्सा सूत्रअग्नि दीपन प्रधान (मन्दाग्नि मूल कारण)
भेदवातज, पित्तज, कफज, घाटिका (सन्निपात)
प्रमुख औषधकुटज, बिल्व, मोचरस, धान्यक, जीरक
योगकुटजारिष्ट, बिल्वादि चूर्ण, ग्रहणी कपाट रस
विशेषपंचकर्म से पूर्व ग्रहणी की चिकित्सा आवश्यक

अध्याय 16 - पाण्डु चिकित्सा (Anaemia)

विषयविवरण
भेदवातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, मृद्भक्षणज (5वाँ)
चिकित्साविरेचन + लौह योग + पथ्य
प्रमुख औषधलौह भस्म, मण्डूर भस्म, त्रिफला, आमलकी
योगनवायस लौह, पुनर्नवा मण्डूर, द्राक्षासव
मृद्भक्षणजमिट्टी खाने से = पिका disorder

अध्याय 17 - हिक्का-श्वास चिकित्सा

विषयविवरण
हिक्का भेद5 प्रकार - अन्नजा, यमला, गम्भीरा, क्षुद्रा, महती
श्वास भेद5 प्रकार - महाश्वास, ऊर्ध्वश्वास, छिन्नश्वास, तमकश्वास, क्षुद्रश्वास
तमकश्वास= Bronchial Asthma (सर्वाधिक प्रासंगिक)
चिकित्सावमन + धूमपान + नस्य
योगश्वासकुठार रस, कनकासव, सितोपलादि, वासारिष्ट
विशेषमहाश्वास, ऊर्ध्वश्वास, छिन्नश्वास = असाध्य

अध्याय 18 - कास चिकित्सा

विषयविवरण
भेदवातज, पित्तज, कफज, क्षतज, क्षयज
वातजस्नेहन + बस्ति
पित्तजविरेचन; घृत + मधु
कफजवमन; त्रिकटु
क्षतजबृंहण + रोपण
क्षयजबृंहण; च्यवनप्राश
योगसितोपलादि चूर्ण, तालिसादि, वासावलेह, द्राक्षासव

अध्याय 19 - अतिसार चिकित्सा (Diarrhoea)

विषयविवरण
भेद6 प्रकार - वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, शोकज, आमज
आमातिसारप्रथम पाचन → फिर स्तम्भन
सामान्य चिकित्सालंघन + पाचन → स्तम्भन
योगकुटजारिष्ट, बिल्वादि, मुस्तकादि

अध्याय 20 - छर्दि चिकित्सा (Vomiting)

विषयविवरण
भेद5 प्रकार - वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, आगन्तुज
चिकित्साअनुलोमन + कारण निवारण
योगशुण्ठी, धान्यक, एला; शंख भस्म

अध्याय 21 - विसर्प चिकित्सा

विषयविवरण
परिभाषातेजी से फैलने वाला त्वचाविकार (Herpes/Spreading skin disease)
भेद7 प्रकार
चिकित्साविरेचन + रक्तमोक्षण + शीत लेप
योगमहातिक्त घृत, नीम तैल

अध्याय 22 - तृष्णा चिकित्सा

विषयविवरण
भेद6 प्रकार
चिकित्साआम्बुवहस्रोतस की शुद्धि
योगउशीर, चन्दन, धान्यक; धान्वन्तर घृत

अध्याय 23 - विष चिकित्सा (Toxicology)

विषयविवरण
विष भेदस्थावर (plant), जंगम (animal), कृत्रिम
चिकित्सा सूत्रतत्काल वमन → विरेचन → शोधन
मारण-विधिविष = शीघ्र मृत्यु; गर (slow poison)
योगसर्पविष - तण्डुलोदक, मयूर पित्त; सर्वविष - महागद
विशेष"आशु चिकित्सा" - शीघ्र उपचार आवश्यक

अध्याय 24 - मदात्यय चिकित्सा (Alcoholism)

विषयविवरण
मद = उचित मात्रा में मद्य; मदात्यय = अतिमद्यपान
भेदवातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज
चिकित्साउद्वर्तन + शीत जलसेक + शोधन
विशेषमद्यपान त्याग = मूल चिकित्सा

अध्याय 25 - द्विव्रणीय चिकित्सा

विषयविवरण
द्विव्रणनिज व्रण (spontaneous) + आगन्तु व्रण (traumatic)
षड्क्रियाशोधन, रोपण, स्नेहन, वर्णसाधन आदि
शस्त्रकर्मचीरना, बाँधना, दाहन
योगजात्यादि तैल, महातिक्त घृत

अध्याय 26 - त्रिमर्मीय चिकित्सा

विषयविवरण
त्रिमर्मशिर (Head) + हृदय (Heart) + बस्ति (Bladder)
शिरोरोगवातज-पित्तज-कफज-रक्तज-कृमिज = 5 प्रकार
हृद्रोगवातज-पित्तज-कफज-कृमिज-त्रिदोषज = 5 प्रकार
मूत्राघात12 प्रकार (मूत्र रुकावट के कारण)
विशेषत्रिमर्म के रोग = अत्यन्त कष्टसाध्य

अध्याय 27 - उरुस्तम्भ चिकित्सा

विषयविवरण
परिभाषाजाँघों की जकड़न/कठोरता; Modern - Thigh stiffness/muscle rigidity
हेतुकफ-वात प्रकोप; स्नेह-दुग्ध का अतिसेवन
चिकित्सारूक्षण (विपरीत = स्नेहन वर्जित!)
विशेषउरुस्तम्भ में स्नेहन हानिकर - विशेष परीक्षा प्रश्न

अध्याय 28 - वातव्याधि चिकित्सा

विषयविवरण
परिचयवात के सर्वाधिक (80) भेद; Modern - Neurological diseases
चिकित्सा सूत्रस्नेहन → स्वेदन → बस्ति
बस्तिवातव्याधि की श्रेष्ठ चिकित्सा
वातव्याधि भेद (प्रमुख)पक्षाघात, अर्दित, कम्पवात, अपतानक, ग्रीध्रसी
पक्षाघातHemiplegia - बस्ति + मृदु स्नेहन
ग्रीध्रसीSciatica - बस्ति + अग्निकर्म
अर्दितFacial palsy - नस्य + धूम + स्नेहन
योगमहारास्नादि क्वाथ, दशमूल तैल, अश्वगन्धारिष्ट

अध्याय 29 - वातरक्त चिकित्सा (Gout)

विषयविवरण
भेदउत्तान (साध्य), गम्भीर (कष्टसाध्य)
चिकित्सास्नेहपान → विरेचन → रक्तमोक्षण
उत्तानलेप + जलौका
गम्भीरस्नेहन + बस्ति
योगगुग्गुलु (महायोगराज), गुडूची, कैशोर गुग्गुलु, महातिक्त घृत
विशेषविरुद्ध चिकित्सा = स्नेहन और रूक्षण एक साथ नहीं

अध्याय 30 - योनिव्यापत् चिकित्सा (Gynaecology)

विषयविवरण
भेद20 प्रकार (योनिव्यापत् के)
सामान्य कारणअपथ्य आहार-विहार, दोषप्रकोप, आर्तव विकृति
चिकित्सायोनि प्रक्षालन, पिचु धारण, उत्तरबस्ति
प्रमुख औषधअशोक, लोध्र, प्रियंगु, शतावरी
योगअशोकारिष्ट, फलघृत, शतावरी घृत
शुक्रदोषशुक्र की 8 विकृतियाँ भी वर्णित

परीक्षा उपयोगी विशेष बिन्दु (Quick Revision)

1. चिकित्सास्थान में 30 अध्याय
2. "लंघनं परमौषधम्" = ज्वर चिकित्सा का सूत्र (अ. 3)
3. अर्श की चतुर्विध चिकित्सा = भेषज > क्षार > अग्निकर्म > शस्त्र
4. उरुस्तम्भ में स्नेहन वर्जित (रूक्षण प्रधान)
5. वातव्याधि में बस्ति = सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा
6. त्रिमर्म = शिर + हृदय + बस्ति
7. मेध्य रसायन 4 = मण्डूकपर्णी, यष्टिमधु, गुडूची, शंखपुष्पी
8. प्रमेह में स्थूल = शोधन; कृश = बृंहण
9. महाश्वास, ऊर्ध्वश्वास, छिन्नश्वास = असाध्य
10. योनिव्यापत् के 20 भेद; अर्श के चिकित्सा 4 विधि; वातव्याधि के 80 भेद

संदर्भ: चरक संहिता, चिकित्सास्थान (अ. 1-30); Caraka Samhita Online

चरक कल्प स्थान

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चरक कल्पस्थान 12 अध्याय वमन विरेचन द्रव्य मात्रा योग परीक्षा

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Charaka Kalpa Sthana 12 chapters vamana virechana drugs madanaphala jimutaka trivrit

उत्कृष्ट जानकारी प्राप्त हुई। अब विस्तृत एवं परीक्षा-उपयोगी वर्णन प्रस्तुत है:

चरक कल्पस्थान - सम्पूर्ण वर्णन

कल्पस्थान का परिचय

चरक संहिता का सप्तम स्थान (7th Section) 12 अध्याय | भैषज्यकल्पना एवं शोधन चिकित्सा का विशेष स्थान
"कल्प" = औषध निर्माण विधि (Pharmaceutical preparation)
उद्देश्य: वमन-विरेचन द्रव्यों की विस्तृत कल्पना (योग) का वर्णन, ताकि पंचकर्म से पूर्व उचित शोधन द्रव्य का चयन हो सके।
पूर्वापर सम्बन्ध:
चिकित्सास्थान → कल्पस्थान → सिद्धिस्थान
(रोग चिकित्सा) (वमन-विरेचन द्रव्य) (बस्ति + पंचकर्म विधि)

12 अध्यायों का वर्गीकरण

वर्गअध्यायकर्म
वमन कल्पअध्याय 1 से 6वमन (Emesis)
विरेचन कल्पअध्याय 7 से 12विरेचन (Purgation)

वमन कर्म (अध्याय 1-6)

अध्याय 1 - मदन कल्प अध्याय ⭐ (सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण)

विषयविवरण
द्रव्यमदनफल (Randia dumetorum / Emetic nut)
वानस्पतिक नामRandia dumetorum / Catunaregam spinosa
पर्यायमदन, शल्यक, पिण्डीतक, फेनिल
उपयोगी अंगफल (Fruit)
संग्रह कालवसन्त-ग्रीष्म ऋतु
कर्मवमन (श्रेष्ठ वमन द्रव्य)
विशेषता"मदनफलं वामनानां श्रेष्ठम्" - वमन द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ
योगक्षीरयोग, क्वाथयोग, लेहयोग, मन्थयोग, मात्रायोग
संख्यामदनफल से अनेक योग (कल्प)
संकेतकुष्ठ, पाण्डु, शोथ, गुल्म, ग्रहणी
मदनफल के प्रमुख कल्प:
कल्पसामग्री
क्षीरयोगमदनफल + दूध
सुरायोगमदनफल + सुरा (fermented liquid)
मांसरसयोगमदनफल + मांसरस
घृतयोगमदनफल + घृत
मन्थयोगमदनफल + जल (मन्थन करके)

अध्याय 2 - जीमूतक कल्प अध्याय

विषयविवरण
द्रव्यजीमूतक (Luffa echinata / Bitter sponge gourd)
उपयोगी अंगपुष्प (Flower)
कर्मवमन
विशेषतामदनफल के समकक्ष; बलवान रोगियों में
संकेतपाण्डु, उदर, गुल्म, कुष्ठ
कल्पक्षीरयोग, सुरायोग, दधियोग, मांसरसयोग, मस्तुयोग, मात्रायोग, लेहयोग

अध्याय 3 - इक्ष्वाकु कल्प अध्याय

विषयविवरण
द्रव्यइक्ष्वाकु (Lagenaria siceraria / Bitter bottle gourd)
वानस्पतिक नामLagenaria siceraria (bitter variety)
उपयोगी अंगपुष्प (Flower)
कर्मवमन
संकेतकुष्ठ, पाण्डु, उदर, प्लीहावृद्धि
विशेषकड़वी लौकी = वमन करती है; मीठी लौकी = सब्जी

अध्याय 4 - धामार्गव कल्प अध्याय

विषयविवरण
द्रव्यधामार्गव (Luffa cylindrica / Ridge gourd - bitter variety)
उपयोगी अंगफल (Fruit)
कर्मवमन
कल्पक्षीरयोग, सुरायोग, अन्नयोग, नस्ययोग, मात्रायोग, लेहयोग
संकेतबलवान रोगी में पाण्डु, उदर, गुल्म

अध्याय 5 - वत्सक कल्प अध्याय (कुटज)

विषयविवरण
द्रव्यवत्सक / कुटज (Holarrhena antidysenterica)
वानस्पतिक नामHolarrhena pubescens
उपयोगी अंगफल / बीज
कर्मवमन + अतिसार/ग्रहणी में विशेष उपयोगी
विशेषवमन के साथ-साथ अतिसार-ग्रहणी में भी प्रमुख

अध्याय 6 - कृतवेधन कल्प अध्याय

विषयविवरण
द्रव्यकृतवेधन (Luffa acutangula / Ridge gourd - wild)
उपयोगी अंगबीज (Seed)
कर्मवमन
संकेतबलवान रोगी में शोथ, पाण्डु, गुल्म

6 वमन द्रव्यों का तुलनात्मक सारांश

द्रव्यवानस्पतिक नामउपयोगी अंगविशेषता
मदनफलRandia dumetorumफलश्रेष्ठ वमन द्रव्य
जीमूतकLuffa echinataपुष्पबलवान रोगी
इक्ष्वाकुLagenaria sicerariaपुष्पकड़वी लौकी
धामार्गवLuffa cylindrica (bitter)फलRidge gourd (bitter)
वत्सक/कुटजHolarrhena pubescensफल/बीजग्रहणी में भी
कृतवेधनLuffa acutangulaबीजWild ridge gourd

विरेचन कर्म (अध्याय 7-12)

अध्याय 7 - श्यामात्रिवृत कल्प अध्याय ⭐

विषयविवरण
द्रव्यत्रिवृत (Operculina turpethum / Indian jalap)
वानस्पतिक नामOperculina turpethum
उपयोगी अंगमूल (Root)
कर्मविरेचन
विशेषता"त्रिवृन्मूलं विरेचनानां श्रेष्ठम्" - विरेचन द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ
भेदश्यामा (काली) + श्वेता (सफेद)
संकेतकुष्ठ, पाण्डु, गुल्म, उदर, शोथ
योगक्षीरयोग, फाण्टयोग, क्वाथयोग, लेहयोग आदि

अध्याय 8 - चतुरंगुल कल्प अध्याय

विषयविवरण
द्रव्यचतुरंगुल / स्नुही (Euphorbia neriifolia)
वानस्पतिक नामEuphorbia neriifolia
उपयोगी अंगक्षीर (Latex/Milk)
कर्मविरेचन (तीव्र)
विशेषस्नुही क्षीर = अत्यन्त तीव्र विरेचन; सावधानी से उपयोग
संकेतबलवान रोगी में जलोदर, उदर

अध्याय 9 - तिल्वक कल्प अध्याय

विषयविवरण
द्रव्यतिल्वक (Symplocos racemosa / Lodhra)
वानस्पतिक नामSymplocos racemosa
उपयोगी अंगत्वक् (Bark) = श्रेष्ठ वल्क विरेचन
विशेषता"वल्केषु तिल्वकः श्रेष्ठः" - छालों में श्रेष्ठ
संकेतपाण्डु, शोथ, योनिरोग

अध्याय 10 - सुधा कल्प अध्याय

विषयविवरण
द्रव्यसुधा (Calotropis gigantea / Madar / Akanda)
वानस्पतिक नामCalotropis gigantea / C. procera
उपयोगी अंगक्षीर (Latex)
कर्मविरेचन (तीव्र)
संकेतजीर्ण कुष्ठ, उदर, विषम ज्वर
विशेषसावधानी आवश्यक; अधिक मात्रा = विषाक्त

अध्याय 11 - सप्तलशंखिनी कल्प अध्याय

विषयविवरण
द्रव्य 1सप्तला (Acacia sinuata / Soap pod)
द्रव्य 2शंखिनी (Canscora decussata / Convolvulus pluricaulis)
कर्मविरेचन
विशेषदो द्रव्यों का एक अध्याय में वर्णन
संकेतकुष्ठ, पाण्डु, उदर

अध्याय 12 - दन्तीद्रवन्ती कल्प अध्याय

विषयविवरण
द्रव्य 1दन्ती (Baliospermum montanum / Wild castor)
द्रव्य 2द्रवन्ती (Croton tiglium / Purging croton)
कर्मविरेचन (तीव्र)
विशेष"फलेषु हरीतकी श्रेष्ठा" - फलों में हरीतकी श्रेष्ठ
संकेतजलोदर, बद्धोदर, प्लीहोदर
विशेषअन्त में हरीतकी का भी वर्णन - फलेषु श्रेष्ठ विरेचन द्रव्य

6 विरेचन द्रव्यों का तुलनात्मक सारांश

द्रव्यवानस्पतिक नामउपयोगी अंगश्रेष्ठता
त्रिवृतOperculina turpethumमूलमूल-वर्ग में श्रेष्ठ
तिल्वकSymplocos racemosaत्वक् (छाल)वल्क-वर्ग में श्रेष्ठ
हरीतकीTerminalia chebulaफलफल-वर्ग में श्रेष्ठ
एरण्डतैलRicinus communisतैलतैल-वर्ग में श्रेष्ठ
करवेल्लकMomordica charantiaरसरस-वर्ग में श्रेष्ठ
स्नुही क्षीरEuphorbia neriifoliaक्षीरक्षीर-वर्ग में श्रेष्ठ

कल्पस्थान की महत्त्वपूर्ण संख्याएँ

विषयसंख्या
कुल अध्याय12
वमन कल्प अध्याय6 (अ. 1-6)
विरेचन कल्प अध्याय6 (अ. 7-12)
वमन द्रव्य6 (मदनफल, जीमूतक, इक्ष्वाकु, धामार्गव, वत्सक, कृतवेधन)
मदनफल के कुल योगअनेक (क्षीर, सुरा, मांसरस, घृत, मन्थ आदि)

वमन-विरेचन द्रव्यों के सामान्य गुण

कर्मद्रव्य गुण
वमन द्रव्यउष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, व्यावायी, विकाशी
विरेचन द्रव्यउष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, व्यावायी, विकाशी
दोनों के गुण प्रायः समान; अन्तर केवल कर्म-स्थान में है।

कल्पस्थान के विशेष सिद्धान्त

1. संग्रह काल का महत्त्व:
  • मदनफल = वसन्त-ग्रीष्म ऋतु में संग्रह
  • ताजे द्रव्य अधिक प्रभावशाली
  • पुराने द्रव्य में शक्ति कम
2. भूमि-देश का प्रभाव:
  • जांगल (dry land) द्रव्य = लघु, रूक्ष
  • आनूप (moist land) द्रव्य = गुरु, स्निग्ध
3. कल्पना के प्रकार:
कल्पनाविवरण
स्वरसताजे द्रव्य का रस
क्वाथकाढ़ा
हिमठण्डे जल में भिगोना
फाण्टउबलते जल में डालना
कल्कपेस्ट
चूर्णपाउडर
4. शोधन क्रम (पंचकर्म से पूर्व):
स्नेहन → स्वेदन → वमनविरेचन → बस्ति → नस्य → रक्तमोक्षण

परीक्षा उपयोगी विशेष बिन्दु

1. कल्पस्थान में कुल 12 अध्याय = 6 वमन + 6 विरेचन
2. "वमनानां श्रेष्ठ" = मदनफल (Randia dumetorum)
3. "विरेचनानां श्रेष्ठ" = त्रिवृत (Operculina turpethum) - मूल
4. "वल्केषु श्रेष्ठ" = तिल्वक (Symplocos racemosa)
5. "फलेषु श्रेष्ठ" = हरीतकी (Terminalia chebula)
6. "तैलेषु श्रेष्ठ" = एरण्डतैल (Castor oil)
7. मदनफल संग्रह = वसन्त-ग्रीष्म ऋतु
8. कल्पस्थान का उद्देश्य = बस्ति से पूर्व वमन-विरेचन द्रव्य ज्ञान
9. सुश्रुत में कल्पस्थान = विषचिकित्सा (दंष्ट्रचिकित्सा) - चरक से भिन्न
10. 5 पञ्चकर्म = वमन > विरेचन > आस्थापन बस्ति > अनुवासन बस्ति > शिरोविरेचन (नस्य)

संदर्भ: Caraka Samhita Kalpa Sthana

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चरक सिद्धिस्थान - विस्तृत जानकारी

सिद्धिस्थान का परिचय

चरक संहिता का अष्टम स्थान (8th Section) 12 अध्याय | चरक संहिता का अन्तिम स्थान
"सिद्धि" = सफलता; अर्थात् चिकित्सा में सफलता कैसे प्राप्त हो
उद्देश्य:
  • पंचकर्म की सम्यक् विधि का वर्णन
  • बस्ति चिकित्सा का विस्तृत वर्णन (सर्वाधिक)
  • वमन-विरेचन-बस्ति की व्यापत् (जटिलताएँ) एवं उनका निवारण
  • चिकित्सक के कर्तव्य एवं नैतिकता
पूर्वापर सम्बन्ध:
कल्पस्थान           →    सिद्धिस्थान
(वमन-विरेचन द्रव्य)      (बस्ति + पंचकर्म सम्पूर्ण विधि)

सिद्धिस्थान का प्रमुख विषय - बस्ति

"बस्तिरर्धं चिकित्सायाः" (च.सि.1/39) "बस्ति = सम्पूर्ण चिकित्सा का आधा भाग"
"बस्तिः सर्वरोगेषु श्रेष्ठा क्रिया" "वातव्याधियों में बस्ति = सर्वश्रेष्ठ"

12 अध्यायों की सूची एवं श्लोक संख्या

अ.अध्याय नामविषयश्लोक
1कल्पना सिद्धिपंचकर्म का परिचय एवं क्रम60
2पंचकर्मीय सिद्धिपंचकर्म की सफल विधि28
3बस्तिसूत्रीय सिद्धिबस्ति के मानक नियम71
4स्नेह व्यापत् सिद्धिअनुवासन बस्ति की जटिलताएँ56
5नेत्रबस्ति व्यापत् सिद्धिबस्ति नलिका की जटिलताएँ19
6वमन-विरेचन व्यापत् सिद्धिवमन-विरेचन की जटिलताएँ95
7बस्ति व्यापत् सिद्धिबस्ति की जटिलताएँ66
8प्रासृत योगीय सिद्धिप्रासृत मात्रा के बस्ति योग46
9त्रिमर्मीय सिद्धित्रिमर्म रोगों की चिकित्सा119
10बस्ति सिद्धिबस्ति की सफलता48
11फलमात्रा सिद्धिबस्ति में फलों का उपयोग37
12उत्तरबस्ति सिद्धिउत्तरबस्ति की विधि55

अध्याय 1 - कल्पना सिद्धि ⭐

पंचकर्म का परिचय एवं क्रम

पंचकर्म के 5 कर्म:
क्र.कर्मकार्य
1वमनऊर्ध्वमार्ग से कफ-दोष निष्कासन
2विरेचनअधोमार्ग से पित्त-दोष निष्कासन
3आस्थापन/निरूह बस्तिकाढ़ा बस्ति से वात-दोष निष्कासन
4अनुवासन बस्तिस्नेह बस्ति - पोषण एवं वात शमन
5शिरोविरेचन (नस्य)नाक से कफ-दोष निष्कासन
पंचकर्म से पूर्व आवश्यक:
  • स्नेहन (oleation - स्नेह सेवन)
  • स्वेदन (sudation - पसीना लाना)
पंचकर्म का क्रम:
स्नेहन → स्वेदन → वमन → विरेचन → बस्ति → नस्य → रक्तमोक्षण
पंचकर्म में वर्जित:
अत्यधिक बैठना, खड़े रहना, बोलना, सवारी, दिन में सोना, मैथुन, वेगावरोध, शीत प्रयोग, धूप सेवन, शोक, क्रोध, असात्म्य आहार।

अध्याय 2 - पंचकर्मीय सिद्धि

पंचकर्म की सफल विधि

शोधन क्रम (क्रमशः):
कर्मदोषमार्गश्रेष्ठ
वमनकफऊर्ध्वकफरोग
विरेचनपित्तअधःपित्तरोग
बस्तिवातअधःवातरोग
नस्यकफ (उर्ध्व)नासिकाशिरोरोग
रक्तमोक्षणरक्तत्वक्रक्त दुष्टि
शमन एवं शोधन का भेद:
  • शोधन = दोष को शरीर से बाहर निकालना (radical cure)
  • शमन = दोष को शान्त करना (palliative)

अध्याय 3 - बस्तिसूत्रीय सिद्धि ⭐⭐ (सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण)

बस्ति के मूलभूत नियम

बस्ति की परिभाषा:
जिस कर्म में औषधि को बस्तिपुट (नलिका) द्वारा गुदामार्ग से प्रविष्ट कराया जाए = बस्ति
बस्ति के 2 मुख्य प्रकार:
प्रकारपर्यायसामग्रीकर्म
निरूह बस्तिआस्थापन बस्तिकाढ़ा (Decoction)शोधन
अनुवासन बस्तिस्नेह बस्तितैल/घृत (Unctuous)बृंहण-पोषण

निरूह बस्ति के घटक

पञ्चाङ्ग (5 अवयव):
क्र.घटकउदाहरण
1मधु (Honey)पुरान मधु
2स्नेह (Oil/Ghee)तिल तैल/एरण्ड तैल
3सैन्धव (Rock salt)सैन्धव लवण
4कल्क (Paste)द्रव्यों का कल्क
5क्वाथ (Decoction)दशमूल/महापञ्चमूल क्वाथ
मिश्रण क्रम:
मधु → स्नेह → सैन्धव → कल्क → क्वाथ (क्रमशः मिलाएँ)

बस्ति मात्रा (Dose)

वर्गनिरूह बस्तिअनुवासन बस्ति
वयस्क (Adult)12 प्रसृत6 प्रसृत
बालक (Child)आयु अनुसारआयु अनुसार
वृद्ध/दुर्बल6 प्रसृत3 प्रसृत
1 प्रसृत = 2 पल = 96 gram (approx)

दोषानुसार अनुवासन बस्ति की संख्या

दोषअनुवासन बस्ति की संख्या
कफज विकार1-3
पित्तज विकार5-7
वातज विकार9-11

अध्याय 3 का विशेष - बस्ति क्रम (Basti Schedule)

तीन प्रमुख बस्ति क्रम

1. योगबस्ति (8 बस्ति का क्रम)
अनुवासन × 3 → निरूह × 1 → अनुवासन × 3 → निरूह × 1
कुल = 5 अनुवासन + 3 निरूह = 8 बस्ति
2. कालबस्ति (16 बस्ति का क्रम)
अनुवासन × 6 → निरूह × 1 → ... क्रम
कुल = 10 अनुवासन + 6 निरूह = 16 बस्ति
3. कर्मबस्ति (30 बस्ति का क्रम)
अनुवासन × 12 → निरूह × 1 → ... क्रम
कुल = 18 अनुवासन + 12 निरूह = 30 बस्ति
बस्ति क्रमकुल बस्तिअनुवासननिरूह
योगबस्ति853
कालबस्ति16106
कर्मबस्ति301812

अध्याय 4 - स्नेह व्यापत् सिद्धि

अनुवासन बस्ति की जटिलताएँ एवं निवारण

व्यापत्कारणलक्षणचिकित्सा
अतिस्नेहअधिक तैलशरीर भारी, दाहवमन + रूक्षण
अल्प सिद्धिकम मात्रालाभ नहींदोबारा देना
विग्रहगलत विधिमल न आनाअनुलोमन
अतिस्त्रावअति तीव्रअत्यधिक मलस्तम्भन

सम्यक् अनुवासन बस्ति के लक्षण (Proper signs):

  • उचित समय पर मल + मूत्र + वायु का निष्कासन
  • शरीर में हल्कापन
  • भूख लगना
  • वर्ण एवं बल में वृद्धि

असम्यक् अनुवासन बस्ति के लक्षण:

  • मल न आना, अफारा
  • शूल, दाह, वमन

अध्याय 5 - नेत्रबस्ति व्यापत् सिद्धि

बस्ति नलिका (Nozzle) सम्बन्धी जटिलताएँ

व्यापत्कारणचिकित्सा
अत्यधिक गहरीनलिका अधिक प्रविष्टधीरे बाहर निकालना
अत्यधिक बाहरनलिका कम प्रविष्टपुनः प्रयास
वक्र नलिकातिरछी प्रविष्टशल्य चिकित्सक बुलाएँ

अध्याय 6 - वमन-विरेचन व्यापत् सिद्धि ⭐

वमन की जटिलताएँ (Vamana Vyapat)

व्यापत्कारणलक्षणचिकित्सा
अतियोग (अति वमन)अधिक औषधअत्यधिक वमन, दौर्बल्यस्तम्भन - अम्ल रस, मधुर द्रव्य
अयोगावस्थाकम वमनवमन नहीं हुआधूम, जल, पुनः औषध
मिथ्यायोगगलत विधिमिश्रित लक्षणकारण अनुसार
वातग्रन्थिवायु ऊपरहिचकी, श्वासवात शमन
रक्तस्रावअति बलरक्त वमनरक्त स्तम्भन

विरेचन की जटिलताएँ (Virechana Vyapat)

व्यापत्लक्षणचिकित्सा
अतियोगअत्यधिक दस्त, दुर्बलतास्तम्भन - कुटज, बिल्व
अयोगदस्त नहीं हुआपुनः विरेचन
परिस्रावरक्त + म्यूकसरक्तस्तम्भन
क्षीणताअत्यधिक क्षयबृंहण चिकित्सा

सम्यक् वमन के लक्षण:

वेगसंख्या: कफज-8, पित्तज-6, वातज-4
सम्यक् = हृदय, श्रोत्र, इन्द्रिय की शुद्धि + लाघव

सम्यक् विरेचन के लक्षण:

वेगसंख्या: उत्तम-30, मध्यम-20, अवर-10
सम्यक् = रोग उपशम + बल वृद्धि + हल्कापन

अध्याय 7 - बस्ति व्यापत् सिद्धि

निरूह बस्ति की जटिलताएँ

व्यापत्लक्षणचिकित्सा
अनागमन (न लौटे)बस्ति वापस न आएपातन + विरेचन
आधमानअफारावायु अनुलोमन
परिस्रावरक्त आनारक्त स्तम्भन
गुदभ्रंशगुदा बाहर आनापुष्य धान्य + बस्ति स्तम्भन
शूलदर्दवात शमन + स्नेहन

सम्यक् निरूह के लक्षण:

मल + मूत्र + वायु का सम्यक् निष्कासन, अग्निदीपन, देह लाघव, रोग उपशमन

अध्याय 8 - प्रासृत योगीय सिद्धि

प्रासृत मात्रा के मानक बस्ति योग

महत्त्वपूर्ण निरूह बस्ति योग:
योग नामप्रमुख द्रव्यसंकेत
यापन बस्तिशतावरी, बला, क्षीरक्षीण रोगी, बृंहण
लेखन बस्तित्रिफला, यव, सैन्धवस्थूलता
मधु-स्नेह बस्तिमधु + तैल + सैन्धवसामान्य वात रोग
महातैल बस्तिदशमूल तैलवातव्याधि

अध्याय 9 - त्रिमर्मीय सिद्धि ⭐ (सर्वाधिक श्लोक - 119)

त्रिमर्म रोगों की चिकित्सा

त्रिमर्म = शिर + हृदय + बस्ति (मूत्राशय)
शिरोरोग (Head diseases):
रोगकारणचिकित्सा
वातज शिरोरोगवात प्रकोपतैल नस्य, शिरोबस्ति
पित्तज शिरोरोगपित्त प्रकोपशीत नस्य, चन्दन
कफज शिरोरोगकफ प्रकोपतीक्ष्ण नस्य, वमन
रक्तज शिरोरोगरक्त दुष्टिरक्तमोक्षण
कृमिज शिरोरोगकीड़ेकृमिघ्न नस्य
हृद्रोग (Heart diseases):
रोगलक्षणचिकित्सा
वातजहृदय कम्पन, वेदनास्नेहन, अनुवासन बस्ति
पित्तजदाह, तृष्णाविरेचन, शीत प्रयोग
कफजभार, मन्दतावमन, दीपन
कृमिजविचित्र लक्षणकृमिघ्न योग
त्रिदोषजमिश्र लक्षणकठिन; शोधन
मूत्राघात (Urinary obstruction) - 12 प्रकार:
प्रकारकारणचिकित्सा
वातकुण्डलिकवातबस्ति + स्नेहन
वातवस्तिवातबस्ति
मूत्रक्षयक्षयबृंहण
उष्णवातपित्त+वातशीत + विरेचन
मूत्रातीतकफवमन
.........

अध्याय 10 - बस्ति सिद्धि

बस्ति की सफलता के संकेत

सफल बस्ति (Siddha Basti) के लक्षण:
  • आयु में वृद्धि
  • सुख + बल + अग्नि + मेधा + स्वर + वर्ण
  • बालक, वृद्ध, युवा सभी के लिए उपयुक्त
  • सभी व्याधियों का शमन
बस्ति के फायदे (श्लोक 27-28):
"बस्तिर्वयःस्थापयिता सुखायुर्बलाग्निमेधास्वरवर्णकृच्च।
सर्वार्थकारी शिशुवृद्धयूनां निरत्ययः सर्वगदापहश्च॥"
बस्ति = आयु स्थापक, सुख+बल+अग्नि+मेधा+स्वर+वर्ण प्रदाता, बालक-वृद्ध-युवा सभी को हितकर।

अध्याय 11 - फलमात्रा सिद्धि

बस्ति में फलों एवं अन्य द्रव्यों का उपयोग

प्रमुख बस्ति में उपयुक्त फल:
फलकर्म
बिल्वग्राही, अग्निदीपन
हरीतकीअनुलोमन, त्रिदोषघ्न
द्राक्षाबृंहण, पित्तशमन
विदारीबृंहण, वातशमन

अध्याय 12 - उत्तरबस्ति सिद्धि ⭐

उत्तरबस्ति (Uttara Basti) - विशेष महत्त्व

परिभाषा:
मूत्रमार्ग (पुरुष) या योनिमार्ग (स्त्री) से दी जाने वाली विशेष बस्ति
विशेषताविवरण
पुरुष मेंमूत्रमार्ग द्वारा
स्त्री मेंयोनिमार्ग द्वारा
मुख्य संकेतमूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, योनिव्यापत्, बन्ध्यत्व
द्रव्यस्नेह (तैल/घृत) + क्वाथ
मात्राअत्यल्प (निरूह से बहुत कम)
उत्तरबस्ति के संकेत:
  • मूत्रकृच्छ्र (Dysuria)
  • मूत्राघात (Urinary retention)
  • अश्मरी (Urinary calculi)
  • श्वेतप्रदर (Leucorrhoea)
  • बन्ध्यत्व (Infertility)
  • योनिशूल (Pelvic pain)

बस्ति के प्रकारों का सम्पूर्ण वर्गीकरण

द्रव्य के आधार पर:

प्रकारद्रव्यकर्म
निरूह/आस्थापनकाढ़ाशोधन
अनुवासनतैल/घृतबृंहण
उत्तरबस्तितैल/क्वाथमूत्र-योनिरोग

संख्या के आधार पर:

क्रमनामसंख्या
1योगबस्ति8
2कालबस्ति16
3कर्मबस्ति30

विशेष बस्ति प्रकार:

नामविशेषता
यापन बस्तिक्षीण को पोषण; दूध + शतावरी
लेखन बस्तिमेद-कफ का लेखन; त्रिफला
पिच्छा बस्तिआँव को हटाना; खोया हुआ श्लेष्म
क्षीर बस्तिदूध आधारित; वातशामक
माधु-तैलिक बस्तिमधु + तैल; सामान्य

सिद्धिस्थान का सारांश - Quick Reference

बस्ति के अध्याय वितरण

विषयअध्याय
पंचकर्म परिचय1-2
बस्ति मूलभूत3
स्नेह व्यापत्4
नेत्र व्यापत्5
वमन-विरेचन व्यापत्6
बस्ति व्यापत्7
बस्ति योग8
त्रिमर्म रोग9
बस्ति सिद्धि10
फलमात्रा11
उत्तरबस्ति12

चरक संहिता के 8 स्थानों का सम्पूर्ण सारांश

स्थानअध्यायविषय
सूत्रस्थान30मूलभूत सिद्धान्त
निदानस्थान8रोग निदान
विमानस्थान8विशिष्ट माप-नियम
शारीरस्थान8शरीर रचना
इन्द्रियस्थान12रोग-पूर्वाभास
चिकित्सास्थान30रोग चिकित्सा
कल्पस्थान12वमन-विरेचन द्रव्य
सिद्धिस्थान12बस्ति + पंचकर्म
कुल120

परीक्षा उपयोगी विशेष बिन्दु

1. "बस्तिरर्धं चिकित्सायाः" = बस्ति सम्पूर्ण चिकित्सा का आधा (सि.1/39)
2. योगबस्ति = 8, कालबस्ति = 16, कर्मबस्ति = 30
3. निरूह = काढ़ा बस्ति = शोधन; अनुवासन = तैल बस्ति = बृंहण
4. कफज में अनुवासन 1-3; पित्तज में 5-7; वातज में 9-11
5. त्रिमर्म = शिर + हृदय + बस्ति (मूत्राशय) - अ.9 में विस्तार
6. सर्वाधिक श्लोक = अ.9 (त्रिमर्मीय) = 119 श्लोक
7. उत्तरबस्ति = पुरुष में मूत्रमार्ग से; स्त्री में योनिमार्ग से
8. यापन बस्ति = क्षीण रोगी हेतु बृंहण बस्ति
9. दृढ़बल द्वारा पूरित 41 अध्याय = चि.17 + क.12 + सि.12
10. सम्यक् वमन वेगसंख्या: कफज-8, पित्तज-6, वातज-4

संदर्भ: चरक संहिता, सिद्धिस्थान (अ. 1-12); Caraka Samhita Online

तृष्णा के प्रकार एवं संप्राप्ति लिखिए। विष की वेगानुसार चिकित्सा लिखिए। मद का अवस्थानुसार वर्णन कीजिए। मूत्राश्मरी का वर्णन कीजिए। उरुस्तम्भ का निदान एवं संप्राप्ति लिखिए। वातरक्त की संप्राप्ति एवं भेद लिखिए। श्यामा त्रिवृत कल्प का वर्णन कीजिए। वमन-विरेचन अन्तर्गत त्रिविध शुद्धि के लक्षण लिखते हुए संसर्जन क्रम का वर्णन कीजिए। अष्ट महादोषकर भावों का वर्णन कीजिए। शिरोविरेचन के प्रकार एवं शिरोविरेचन हेतु अयोग्य रोगी का वर्णन कीजिए। हृदयरोग के लक्षण एवं प्रकार लिखिए। अपस्मार के प्रकार, संप्राप्ति, लक्षण एवं चिकित्सा सूत्र लिखिए। विसर्प के प्रकार एवं साध्य-असाध्यता लिखिए। नस्य कर्म का वर्णन कीजिए। विरेचन के योग्य, अयोग्य एवं सम्यक् विरेचन लक्षण लिखिए। च्यवनप्राश का वर्णन कीजिए। आवरण का वर्णन कीजिए। हिक्का के प्रकार, लक्षण एवं साध्य-असाध्यता लिखिए। विरेचन व्यापद का वर्णन कीजिए। उदर रोग का वर्णन कीजिए। ज्वर में घृतपान का महत्व लिखिए। चरकसंहिता में वर्णित मद का वर्णन कीजिए। शुक्रदोष का वर्णन कीजिए। उन्माद का वर्णन कीजिए। छर्दि के प्रकार, लक्षण एवं साध्य-असाध्यता का वर्णन कीजिए। आयु के अनुसार अनुवासन बस्ती की मात्रा का वर्णन कीजिए। उदावर्त रोग का वर्णन कीजिए। अतत्त्वाभिनिवेश महागद का वर्णन एवं उसकी चिकित्सा लिखिए। बस्तिदाता दोष कितने हैं? वर्णन कीजिए। सुधाकल्प का वर्णन कीजिए। उरुस्तम्भ के प्रकार एवं चिकित्सा लिखिए। वमन व्यापद लिखिए। संसर्जन कर्म का वर्णन कीजिए। आर्दित के लक्षण एवं चिकित्सा लिखिए। महाकुष्ठ के प्रकार तथा सिद्ध कुष्ठ की चिकित्सा लिखिए। पाण्डु-कमला की चिकित्सा लिखिए। फलमात्रा सिद्धि अध्याय में वर्णित फलों की रोगानुसार श्रेष्ठता लिखिए। चतुरंगुल कल्प का वर्णन कीजिए। जीर्ण ज्वर का वर्णन कीजिए। हिक्का-श्वास-कास की संप्राप्ति, चिकित्सा सूत्र एवं भेद की व्याख्या कीजिए। कमला रोग का वर्णन कीजिए। वातरक्त का निदान लिखिए। आमाशय रोग का निदान एवं चिकित्सा लिखिए। अष्ट महादोषकर भावों का वर्णन कीजिए। उन्माद एवं अपस्मार में अंतर लिखिए। आयु के अनुसार निरूह बस्ती का वर्णन कीजिए। स्तन्य रोग — संप्राप्ति, प्रकार एवं चिकित्सा लिखिए। ग्रहणी की चिकित्सा लिखिए। बस्तिनेत्र के दोष लिखिए। संसर्जन क्रम का वर्णन कीजिए। औषध सेवन का वर्णन कीजिए। संशोधन के अतियोगजन्य व्यापत्तियों का वर्णन कीजिए। तृष्णा के प्रकार एवं चिकित्सा का वर्णन कीजिए। बद्धगुदोदर का वर्णन कीजिए। मदात्यय के चरणों की व्याख्या कीजिए। विषमज्वर की चिकित्सा सहित व्याख्या कीजिए। प्रमेह चिकित्सा सूत्र की व्याख्या करते हुए मध्यासव के बारे में लिखिए। धमर्गव कल्प का वर्णन कीजिए। आचार रसायन का वर्णन कीजिए। आनाह में एरण्ड तैल का प्रयोग लिखिए।


चरक संहिता - व्यापक प्रश्नोत्तर संग्रह

समूह 1 - तृष्णा, विष, मद, मूत्राश्मरी

1. तृष्णा के प्रकार एवं संप्राप्ति

तृष्णा के 6 प्रकार (च.चि.22)
प्रकारमूल दोषसंप्राप्तिलक्षण
वातजवातवात → आम्बु स्रोतस अवरोधसूखी प्यास, ठण्डी पानी की इच्छा
पित्तजपित्तपित्त → रस+रक्त दूषण → दाहअत्यधिक दाह, घृणा
कफजकफकफ → मधुरत्वमीठे की इच्छा
क्षयजक्षयधातुक्षय → क्लेद अभावसूख जाना
आमजआमआमसंचय → विषमताअनियमित
नैमित्तिकआगन्तुदुर्गन्ध, उष्ण जल आदिस्पष्ट कारण
संप्राप्ति:
दोष → आम्बुवहस्रोतस अवरोध → रस-क्लेद अभाव → तृष्णा
चिकित्सा: आम्बुवहस्रोतस शुद्धि; उशीर, चन्दन, धान्यक

2. विष की वेगानुसार चिकित्सा (च.चि.23)

तीन वेग (तीव्रता के अनुसार):
वेगसमयलक्षणचिकित्सा
आशु (तीव्र)तुरन्तशीघ्र मरण का संकटतत्काल वमन (Primary) → विरेचन → शोधन
मध्यकुछ समयधीरे-धीरे असरसामान्य विरेचन + औषध
मन्द (विष)धीमादीर्घकालीनदीर्घकालीन चिकित्सा + रसायन
सामान्य विष चिकित्सा क्रम:
तत्काल वमन → विरेचन → शोधन (क्रमशः) → औषध + पथ्य
विशेष:
गर (slow poison) = धीरे-धीरे मारने वाला; विष (तीव्र) = तुरन्त

3. मद का अवस्थानुसार वर्णन

मद के 5 अवस्था (च.सु.27)
अवस्थासमयलक्षणविशेष
प्रथमतत्कालहल्का नशास्मृति रहती है
द्वितीय1-2 घंटावाणी अस्पष्टगति अस्थिर
तृतीय2-3 घंटाचेतना अस्पष्टअर्धमूर्च्छा
चतुर्थ3-4 घंटापूर्ण मूर्च्छाचलना-फिरना असम्भव
पंचमअधिक समयमृत्युमस्तिष्क क्षति
चिकित्सा:
  • उद्वर्तन (dry massage)
  • ठण्डे जल का छिड़काव
  • सुगन्ध नस्य
  • मधु + गुड़ का आहार

4. मूत्राश्मरी (Urinary calculi) का वर्णन

निष्ठीवन रोग = गुर्दे/मूत्र मार्ग की पथरी
विषयविवरण
हेतुक्षय, विषम भोजन, सूखा आहार, वेगावरोध
दोषवात-पित्त प्रधान
लक्षणमूत्रकृच्छ्र (difficulty) + मूत्र रुकावट + वेदना
प्रकार3-4 प्रकार (दोषानुसार)
चिकित्साउत्तरबस्ति (primary), औषध + मूत्रल द्रव्य
प्रमुख औषधगोक्षुर, शिलाजीत, अश्मरीहर योग

समूह 2 - उरुस्तम्भ, वातरक्त, कल्प

5. उरुस्तम्भ का निदान एवं संप्राप्ति

परिभाषा: जाँघों की जकड़न/कठोरता (Thigh stiffness)
विषयविवरण
हेतुकफ-वात प्रकोप, स्नेह-दुग्ध का अतिसेवन
दूष्यकफ, वात
संप्राप्तिकफ-वात → उरु स्नायु → कठोरता
लक्षणजाँघ में अकड़, गति में कठिनाई
चिकित्सारूक्षण प्रधान ⚠️
विशेष⚠️ स्नेहन हानिकर (opposite to normal) - महत्त्वपूर्ण
परीक्षा प्रश्न: "उरुस्तम्भ में स्नेहन क्यों हानिकर है?" उत्तर = कफ प्रकोप + स्नेह की अधिकता

6. वातरक्त की संप्राप्ति एवं भेद (च.चि.29)

परिभाषा: वात + रक्त का संयुक्त विकार (Gout)
विषयविवरण
दोषवात + पित्त का समन्वय
दूष्यरक्त, वात
संप्राप्तिवात-पित्त → रक्त दूषण → अस्थि-स्नायु-माँस में वेदना
भेद:
भेदसाध्यतासंकेत
उत्तानसाध्यत्वचा पर विकार स्पष्ट
गम्भीरकष्टसाध्यगहरे ऊतक प्रभावित
चिकित्सा: स्नेहपान → विरेचन → रक्तमोक्षण

7. श्यामात्रिवृत कल्प का वर्णन

द्रव्य: त्रिवृत (Operculina turpethum) - विरेचन द्रव्यों का श्रेष्ठ
विषयविवरण
भेदश्यामा (काली), श्वेता (सफेद)
उपयोगी अंगमूल (जड़) = मूल वर्ग में श्रेष्ठ
संग्रह कालग्रीष्म ऋतु
योगक्षीरयोग, फाण्टयोग, क्वाथयोग, लेहयोग
विशेष"त्रिवृन्मूलं विरेचनानां श्रेष्ठम्"
संकेतकुष्ठ, पाण्डु, गुल्म, उदर, शोथ

समूह 3 - वमन-विरेचन, महादोषकर, शिरोविरेचन

8. वमन-विरेचन अन्तर्गत त्रिविध शुद्धि के लक्षण एवं संसर्जन क्रम

त्रिविध शुद्धि के लक्षण:
शुद्धिसंकेतलक्षण
अवर शुद्धि10 वेगहल्का निष्कासन
मध्यम शुद्धि20 वेगमध्यम निष्कासन
उत्तम शुद्धि30 वेगपूर्ण निष्कासन (कफ→पित्त→पित्तजल)
संसर्जन क्रम (शोधन के बाद पुनः आहार)
दिनआहारमात्राविशेष
1यवागु (पतला)अल्पशाम को
2यवागु + घृतमध्यमदिन-शाम
3पायस (खीर)मध्यमहल्का
4दाल-चावल + घृतसामान्यसुपाच्य
5सामान्य आहारसामान्यपथ्य अनुसार
"संसर्जन क्रम का उद्देश्य" = अग्नि को धीरे-धीरे बढ़ाना, अकस्मात् भोजन से व्यापत् न हो

9. अष्ट महादोषकर भाव (Ch.Su.25)

दोष को बढ़ाने वाले 8 कारण:
क्र.भावपरिणाम
1दोष का सदृश आहारदोष बढ़ता है
2बल का हीन होनाप्रतिरोध क्षमता घटती है
3काल का अनुकूल होना(ऋतु-मौसम-दिन-रात)
4दोष की स्वाभाविक वृद्धि(प्राकृतिक परिस्थिति)
5आहार की अधिकताअधिक सेवन
6अग्नि की मन्दतापाचन क्षमता कम
7मल का संचयविषाक्त पदार्थ संचय
8समीप-समीप सेवनवार-वार दोष उद्दीपन

10. शिरोविरेचन के प्रकार एवं अयोग्य रोगी

शिरोविरेचन (नस्य) के प्रकार:
प्रकारविवरण
तैल नस्यतैल का प्रयोग - वातशामक
घृत नस्यघृत - पित्तशामक
क्षार नस्यक्षार - कफघ्न
सूप नस्यतेल का धुँआ - शोथघ्न
उत्तम नस्यगुणयुक्त नस्य - सर्वोत्तम
शिरोविरेचन के लिए अयोग्य रोगी:
स्त्री (मासिक धर्म के समय), बालक (<5 वर्ष), वृद्ध (>80 वर्ष), गर्भवती, शोथ से ग्रस्त, दुर्बल, नव-रोग, वमन-विरेचन के तुरन्त बाद

समूह 4 - हृदय, अपस्मार, विसर्प

11. हृदयरोग के लक्षण एवं प्रकार (त्रिमर्मीय सिद्धि)

5 प्रकार:
प्रकारलक्षण
वातजहृदय में कम्पन, वेदना, अरोचक, अनिद्रा
पित्तजदाह, तृष्णा, मुखरस परिवर्तन
कफजभार, मूर्च्छा, तन्द्रा, श्वास
कृमिजविचित्र लक्षण, खुजली
त्रिदोषजमिश्र लक्षण - असाध्य
चिकित्सा: दोषानुसार; वातज = स्नेहन + अनुवासन; पित्तज = विरेचन; कफज = वमन

12. अपस्मार के प्रकार, संप्राप्ति, लक्षण एवं चिकित्सा सूत्र

4 प्रकार:
प्रकारसंप्राप्तिलक्षणसाध्यता
वातजवात → मज्जा-हृदय आवरणकृष्ण दृष्टि, फेन, वायु शब्दसाध्य
पित्तजपित्त → मनोवहस्रोतसपीत दृष्टि, दाह, स्वेदसाध्य
कफजकफ → मनोवहस्रोतसश्वेत दृष्टि, कफ, अल्प चेष्टासाध्य
सन्निपातजसन्निपात → मस्तिष्कमिश्र लक्षणअसाध्य
चिकित्सा सूत्र:
घृतपान → वमन → विरेचन → नस्य → शिरोबस्ति → ब्राह्मी योग

13. विसर्प के प्रकार एवं साध्य-असाध्यता

7 प्रकार:
प्रकारसंकेतसाध्यता
सामान्य विसर्पत्वक् को लपेटता हुआसाध्य
मण्डल विसर्पगोलाकार फैलावसाध्य
रूक्षविसर्परूखा त्वचा विकारसाध्य
अग्निविसर्पतीव्र दाहसाध्य (उपचार से)
कैरवजल के समान पारदर्शकसाध्य
श्वित्रसफेद दागसाध्य
कुष्ठसंश्रितकुष्ठ के साथकष्टसाध्य
असाध्य: यदि 10 वर्ष से पुराना हो, या तीनों दोष सम्मिलित हों

समूह 5 - नस्य, विरेचन, च्यवनप्राश

14. नस्य कर्म का वर्णन

नस्य = अनुमार्ग से औषध देना (Nasal therapy)
विषयविवरण
मार्गनाक (दोनों नथुनों से)
औषधतैल, घृत, क्षार, सूप आदि
मात्रा8 बूँद प्रति नथुना (typical)
क्रिया-कालप्रातःकाल, भोजन के बाद
लाभशिरोरोग, कृमि, अनिद्रा का शमन
संकेतशिरोगुरुत्व, कृमि, नास्रोत अवरोध
नस्य के प्रभाव:
शिर-कर्ण-नयन-ग्रीवा के रोगों में विशेष लाभ

15. विरेचन के योग्य, अयोग्य एवं सम्यक् विरेचन लक्षण

विरेचन के योग्य रोगी:
  • पित्तज रोग, कुष्ठ, पाण्डु, उदर, शोथ
  • वयस् = 16-70 वर्ष
  • बलवान, सुस्थ पाचन
विरेचन के अयोग्य रोगी:
  • वातज रोग, बालक, वृद्ध
  • वमन-बस्ति के तुरन्त बाद
  • दुर्बल, प्रसवोत्तर स्त्री
सम्यक् विरेचन के लक्षण:
विषयविवरण
वेग संख्या10, 20, 30 (अवर-मध्यम-उत्तम)
रंगहरा → भूरा → पीला → स्वच्छ रंग
गुणगन्ध रहित, तरल, निष्कष्ट
परिणामअग्निदीपन, लाघव, रोग उपशम

16. च्यवनप्राश का वर्णन

सबसे महत्त्वपूर्ण रसायन = आवलेह (Jam-like formulation)
विषयविवरण
मुख्य द्रव्यआमलकी (50 भाग)
अन्य द्रव्यशतावरी, विदारी, बला, पिप्पली, दालचीनी, शहद, घृत
रूपआवलेह (लड्डू/पेस्ट)
रसमधुर, अम्ल, तिक्त
गुणग्राही, पौष्टिक, रसायन
मात्रा1-2 चम्मच प्रातः-सायं
संकेतसर्वरोग निवारण, दीर्घायु, स्मृति, बल
विशेषसर्वश्रेष्ठ रसायन - सभी को हितकर

समूह 6 - आवरण, हिक्का, विरेचन व्यापद

17. आवरण का वर्णन

परिभाषा: दोषों द्वारा अग्नि/धातु का आच्छादन
विषयविवरण
कारणअग्नि स्थान पर दोष/आम का आवरण
लक्षणअरोचक, जिह्वामन्दता, अपच
भेदआम-आवरण (कफ-वात), पित्त-आवरण
चिकित्सादीपन-पाचन प्रधान (आम पाचन)
औषधत्रिकटु, चित्रक, शुण्ठी, पिप्पली

18. हिक्का के प्रकार, लक्षण एवं साध्य-असाध्यता

5 प्रकार:
प्रकारलक्षणअवधिसाध्यता
आनवशायिनी (अन्नजा)अन्न के बाद हिचकीथोड़ी देरसाध्य
यमलायुग्म-पेयर मेंमध्यमसाध्य
गम्भीरागहरी, तीव्रअधिककष्टसाध्य
क्षुद्राछोटी, सूक्ष्मकुछ समयसाध्य
महतीबहुत तीव्रलम्बाअसाध्य
अन्य असाध्य हिक्का:
जो 10 दिन से अधिक चले, जीर्ण, कृमिज, दोनों फेफड़े प्रभावित

19. विरेचन व्यापद का वर्णन

विरेचन से होने वाली 7 व्यापद:
व्यापदकारणलक्षणचिकित्सा
अतियोगअधिक विरेचनअत्यधिक दस्त, दुर्बलतास्तम्भन - कुटज, बिल्व
अयोगकम विरेचनदस्त नहीं हुआपुनः विरेचन दें
मिथ्यायोगगलत विधिअपूर्ण निष्कासनसुधार करें
परिस्रावतीव्र विरेचनरक्त + म्यूकसरक्तस्तम्भन
आधमानअपूर्ण वेगपेट फूलनापवन अनुलोमन
क्षीणताअत्यधिक क्षयदुर्बलताबृंहण चिकित्सा
व्रणआँतों को घावखून आनारक्त स्तम्भन

समूह 7 - उदर, ज्वर, शुक्रदोष

20. उदर रोग का वर्णन

8 प्रकार उदर (च.चि.13):
प्रकारहेतुलक्षणचिकित्सा
वातोदरवातपीड़ा, ध्वनि, कब्जस्नेहन + बस्ति
पित्तोदरपित्तदाह, पीला रंग, दस्तविरेचन
कफोदरकफभार, मन्दता, रूचि अभाववमन
सन्निपातोदरसन्निपातमिश्र लक्षणशोधन (क्रमशः)
प्लीहोदरप्लीहा वृद्धिबायीं ओर शोथतिक्त द्रव्य, रक्तमोक्षण
बद्धोदरमल बंधकठोर गुदा, मल रुकावटविरेचन + स्नेहन
आगन्तुजोदरआघात/आचारअचानक फूलनाकारण निवारण
क्षतजोदरआघात से गहरागम्भीर शोथशल्य चिकित्सा
सामान्य चिकित्सा: गोमूत्र + पुनर्नवा + विरेचन
विशेष: "उदर में लंघन अहितकर" = बृंहण प्रधान

21. ज्वर में घृतपान का महत्व

घृत (Ghee) का उपयोग:
विषयविवरण
कालशोथ-काल से पूर्व (प्रारम्भ में)
मात्रा1-2 चम्मच (धीरे-धीरे बढ़ाएँ)
लाभज्वर की तीव्रता कम करे
कारणदोष को मृदु, स्नेहित बनाए
विशेषउच्च ज्वर में घृत नहीं दें
"घृतं ज्वरे श्रेष्ठम्" = ज्वर में घृत सर्वश्रेष्ठ (शोधन से पहले)

22. चरकसंहिता में वर्णित मद का वर्णन

मद (Alcohol) की परिभाषा:
सुरा और सुरापात (दाखमधु आदि) से उत्पन्न नशा = मद
विषयविवरण
उपयोगऔषधि के रूप में (समोच्छायनीय)
मात्रापलाश फल मात्रा (small quantity)
संकेतशोथ, अपच, भय, अनिद्रा
विरुद्धअत्यधिक सेवन = मदात्यय (disease)
दोषतिक्त रस = कफ-वात शामक, पित्तवर्धक
चिकित्सा: मद त्याग = मूल उपचार

23. शुक्रदोष का वर्णन

शुक्र की 8 विकृतियाँ (योनिव्यापत्)
विकृतिलक्षणकारण
अल्प शुक्रत्वकम स्खलनआहार कमी, व्यायाम
पीनसत्वपतला बहनापित्त प्रकोप
वातवाहुल्यतेजी से बहनावात विकोप
कफबहुलत्वगाढ़ा, चिपचिपाकफ विकोप
रक्तमिश्रत्वरक्त मिश्रितरक्त दुष्टि
रंग विकारपीला/काला रंगदोष विकोप
गन्धविकारबदबूदारआम दोष
वीर्यविकारकोई शक्ति नहींसर्वांग क्षय
चिकित्सा: वाजीकरण योग; शतावरी, अश्वगन्धा, कपिकच्छु

समूह 8 - उन्माद, छर्दि, बस्ति, उदावर्त

24. उन्माद का वर्णन

मानसिक विकार = मनस्, बुद्धि, चित्त, स्मृति का विकार
5 प्रकार:
प्रकारवेगलक्षणसाध्यता
वातजतीव्रहँसना, गाना, रोना बेकार मेंसाध्य
पित्तजमध्यमक्रोध, अस्त्र ग्रहणसाध्य
कफजधीमामौन, एकान्त प्रियसाध्य
सन्निपातजमिश्रसभी के लक्षणअसाध्य
आगन्तुजअचानकदेव-भूत आवेशकष्टसाध्य
चिकित्सा सूत्र:
घृतपान → वमन → विरेचन → नस्य → शिरोबस्ति

25. छर्दि के प्रकार, लक्षण एवं साध्य-असाध्यता

5 प्रकार वमन:
प्रकारहेतुलक्षणसाध्यता
वातजवातखट्टा, जलन, रुक-रुक करसाध्य
पित्तजपित्तपीला, दाह, कड़वासाध्य
कफजकफसफेद, मीठा, श्लेष्मा युक्तसाध्य
सन्निपातजसन्निपातमिश्र स्वाद-रंगकष्टसाध्य
आगन्तुजआघात/जहरविचित्र लक्षणविषय पर निर्भर
असाध्य छर्दि:
पूरे जीवन से, 10 दिन से अधिक जारी, तीनों दोष एकसाथ

26. आयु के अनुसार अनुवासन बस्ती की मात्रा

मात्रा आयु के अनुसार (च.सि.1):
आयुअनुवासन मात्रानिरूह मात्रा
1-5 वर्ष1.5-2 प्रसृत3-4 प्रसृत
5-10 वर्ष2-3 प्रसृत4-6 प्रसृत
10-16 वर्ष3-4 प्रसृत6-8 प्रसृत
16-70 वर्ष4-6 प्रसृत8-12 प्रसृत
70+ वर्ष2-3 प्रसृत4-6 प्रसृत
1 प्रसृत = 96 gram (approx)

27. उदावर्त रोग का वर्णन

परिभाषा: वायु का ऊपर की ओर प्रवाह (Hiatal hernia/GERD जैसा)
विषयविवरण
हेतुवायु, कब्ज, भारी भोजन
लक्षणछाती में जकड़न, हिचकी, श्वास में कठिनाई
दोषवात प्रधान
चिकित्सावात शमन, स्नेहन, बस्ति
प्रमुख औषधअनुलोमन, हिंग्वाष्टक

समूह 9 - महागद, बस्तिदाता, आर्दित, महाकुष्ठ

28. अतत्त्वाभिनिवेश महागद का वर्णन एवं चिकित्सा

परिभाषा: जहर की पहचान न करना = गलत विषमान
विषयविवरण
अर्थजो विष को सही तरीके से नहीं पहचानते (न विष, न गर, न किरमि विष)
लक्षणअनिश्चित दोष, भ्रमणशील लक्षण
चिकित्सासार्वभौमिक महागद (महागद योग)
संकेतसभी प्रकार की विषहरता
महागद = सार्वभौमिक विषनाशक योग

29. बस्तिदाता दोष कितने हैं? वर्णन कीजिए

बस्ति देने में चिकित्सक के 7 दोष (ch.si.7)
दोषपरिणाम
मन्द गतिबस्ति धीरे लगे, अपूर्ण निष्कासन
तीव्र गतिबस्ति तेजी से निकले, नुकसान
अधिक मात्राअत्यधिक निष्कासन, क्षीणता
कम मात्राअपूर्ण निष्कासन, लाभ नहीं
अनुचित कालगलत समय पर बस्ति = व्यापद
अनुचित रोगीजिसे नहीं देना चाहिए, दे दिया
अनुचित विधिगलत तरीके से प्रयोग किया

30. सुधाकल्प का वर्णन

द्रव्य: सुधा (Calotropis gigantea / Madar / Akanda)
विषयविवरण
वानस्पतिक नामCalotropis gigantea / C. procera
उपयोगी अंगक्षीर (latex) = तीव्र विरेचन
कल्पनदूध के साथ, तेल के साथ
मात्रा2-4 बूँद (अत्यधिक सावधानी से)
संकेतजीर्ण कुष्ठ, उदर, विषम ज्वर, बलवान रोगी
विशेष⚠️ अत्यधिक तीव्र = विष के समान कार्य करे तो जहर हो सकता है

31. उरुस्तम्भ के प्रकार एवं चिकित्सा

2 प्रकार:
प्रकारलक्षणचिकित्सा
वातजोरुस्तम्भअकड़न, वेदनास्नेहन + बस्ति
कफजोरुस्तम्भगुरुत्व, जकड़नरूक्षण + दीपन
⚠️ विशेष: उरुस्तम्भ में स्नेहन हानिकर नहीं है जब वात न हो; कफ़ प्रधान में रूक्षण ही देना चाहिए

32. वमन व्यापद लिखिए

वमन की 7 व्यापद:
व्यापदकारणलक्षणचिकित्सा
अतियोगअधिक औषधअत्यधिक वमन, दुर्बलतास्तम्भन (अम्ल, कषाय)
अयोगकम औषधवमन न हुईपुनः प्रयास
मिथ्यायोगगलत विधिअपूर्ण उद्वहनसुधार करें
परिस्त्रावनलिका बड़ीगलत मार्गसावधानी करें
वातग्रन्थिवायु ऊपरहिचकी, श्वासवात शमन
आधमानपेट फूलनाअफारा, वेदनापवन अनुलोमन
रक्तस्त्रावरक्तवाहिनी फटनारक्त वमनरक्त स्तम्भन

33. संसर्जन कर्म का वर्णन

परिभाषा: शोधन के पश्चात् धीरे-धीरे आहार शुरू करना
5 दिनों का संसर्जन क्रम:
दिनआहाररूपपरिमाणसमय
1यवागुपतला पेयअल्पसायंकाल
2यवागु + घृतहल्का गाढ़ामध्यमदोनों समय
3खीर/पायसमाध्यममध्यमदोनों समय
4मूंग दाल + चावलसामान्यसामान्यदोनों समय
5+साधारण पथ्य आहारसामान्यसामान्यनियमित
संसर्जन के नियम:
  • धीरे-धीरे अग्नि बढ़ाएँ
  • रुई जैसा हल्का आहार दें
  • अचानक भारी भोजन न दें
  • यदि अपच हो तो पीछे लौटें

34. आर्दित के लक्षण एवं चिकित्सा

परिभाषा: ½ चेहरे का पक्षाघात (Facial palsy / Bell's palsy)
विषयविवरण
वेग का स्थानचेहरे की नस/रग का आवरण
लक्षणआधा चेहरा गतिहीन, मुँह टेढ़ा, नेत्र बन्द न हो
हेतुवायु प्रकोप, ठण्ड, आघात
चिकित्सानस्य (तैल) + धूम + स्नेहन
प्रमुख औषधमहारास्नादि तैल, कौमारभृत्य तैल

35. महाकुष्ठ के प्रकार तथा सिद्ध कुष्ठ की चिकित्सा

महाकुष्ठ के 7 प्रकार:
क्र.प्रकारलक्षणसाध्यता
1कापालम्सिर की त्वचाकष्टसाध्य
2औदुम्बरम्गहरा विकारकष्टसाध्य
3मण्डलम्गोलाकारसाध्य
4ऋक्षजिह्वम्आभा परिवर्तनकष्टसाध्य
5पुण्डरीकम्कमल जैसासाध्य
6सिध्मम्तेजी से फैलेकष्टसाध्य
7कालम्सबसे गहराअसाध्य
सिद्ध कुष्ठ की चिकित्सा:
शल्य चिकित्सा = क्षार, अग्निकर्म, शस्त्र

समूह 10 - पाण्डु, नस्य, आचार रसायन

36. पाण्डु-कमला की चिकित्सा

पाण्डु = Anaemia; कमला = Jaundice
रोगलक्षणहेतुचिकित्सा
पाण्डुपीलापन, दुर्बलतारक्त की कमीविरेचन + लौह योग
कमलापीलापन + दाहपित्त वृद्धिविरेचन + शीत प्रयोग
प्रमुख औषध:
  • पाण्डु: लौह भस्म, मण्डूर भस्म, पुनर्नवा मण्डूर
  • कमला: रोहितकारिष्ट, भूमि आमलकी, भृंगराज

37. फलमात्रा सिद्धि अध्याय में वर्णित फलों की रोगानुसार श्रेष्ठता

निरूह बस्ति में प्रमुख फल:
फलकर्मसंकेत
बिल्वग्राही, स्तम्भनअतिसार
हरीतकीअनुलोमन, त्रिदोषघ्नसामान्य कब्ज
आमलकीरसायन, दीपनसर्वरोग
द्राक्षाबृंहण, पौष्टिकक्षीण रोग
विदारीशक्तिदायकवात शामन

38. चतुरंगुल कल्प का वर्णन

द्रव्य: चतुरंगुल / स्नुही (Euphorbia neriifolia)
विषयविवरण
उपयोगी अंगक्षीर (latex) = अत्यधिक तीव्र विरेचन
मात्रा2-4 बूँद (अत्यन्त सावधानी से)
संकेतबलवान रोगी में जलोदर, उदर
विशेष⚠️ अति तीव्र = विरेचन का श्रेष्ठ किंतु खतरनाक
नामचारों अंगों (roots, stems, leaves, flowers) का संयोग

39. जीर्ण ज्वर का वर्णन

परिभाषा: 30 दिन से अधिक अवधि वाला ज्वर
विषयविवरण
संप्राप्तिक्रोनिक दोष प्रकोप → स्थायी अग्नि दुर्बलता
लक्षणकम ताप, दुर्बलता, अरोचक, रस क्षय
दोषवात + कफ प्रधान (पित्त घट जाती है)
चिकित्साबृंहण प्रधान + दीपन + रसायन
औषधच्यवनप्राश, अश्वगन्धा, शतावरी, संशमनी
विशेषशोधन वर्जित = बृंहण अनिवार्य

40. हिक्का-श्वास-कास की संप्राप्ति, चिकित्सा सूत्र एवं भेद

तीनों रोगों की तुलना:
रोगसंप्राप्तिभेदचिकित्सा सूत्र
हिक्कावात-कफ → प्राण5वमन + धूम
श्वासवात-कफ → उदान5वमन + नस्य
काससभी दोष → प्राण-उदान5दोषानुसार
सम्यक् चिकित्सा:
सितोपलादि + वासारिष्ट + द्राक्षा + मधु

41. कमला रोग का वर्णन

पीलिया = Jaundice (पित्तजन्य रोग)
विषयविवरण
हेतुपित्त प्रकोप, विरुद्ध आहार, शोक-क्रोध
लक्षणपीलापन (त्वचा-नयन-मूत्र), दाह, अरोचक
भेददोषानुसार (पित्त प्रधान)
चिकित्साविरेचन + शीत प्रयोग + तिक्त द्रव्य
औषधभूमि आमलकी, भृंगराज, रोहितकारिष्ट
आहारजौ, मूंग, दूध, शहद

42. वातरक्त का निदान लिखिए

निदान = रोग के कारण:
निज निदान (Internal causes):
  1. हेतु: विरुद्ध आहार, उष्ण-तीक्ष्ण पदार्थ
  2. काल: ग्रीष्म ऋतु
  3. क्रिया: व्यायाम, आघात
  4. भावनाएँ: क्रोध, चिन्ता
आगन्तु निदान (External causes):
  • आघात, घाव, आँचल
परिणाम: वात-पित्त → रक्तदूषण → गाउट

43. आमाशय रोग का निदान एवं चिकित्सा

आमाशय = Stomach disease
विषयविवरण
निदानअधिक व्यायाम, वेगावरोध, विरुद्ध भोजन, चिन्ता
लक्षणपेट में दर्द, खट्टी डकार, मतली, कब्ज
दोषवात + कफ प्रधान
चिकित्साआम पाचन (दीपन) → अनुलोमन → उपचार
औषधहिंग्वाष्टक, शुण्ठी, अजीर्ण हर योग

44. अष्ट महादोषकर भावों का वर्णन (पुनः)

पहले वर्णित (प्रश्न 9 देखें)

45. उन्माद एवं अपस्मार में अंतर

विषयउन्मादअपस्मार
मूल लक्षणमनोविकार, चेतना रहतीस्मृतिभ्रंश, चेतना जाती है
आवेगनहींआक्षेप (Convulsions)
अवधिलम्बी/दीर्घकालीनशीघ्र (कुछ मिनट)
स्मृतिकुछ स्मृति बची रहतीपूर्ण भूलना
फेन आदिनहींहाँ
दन्त कटननहींहाँ
साध्यतासाध्य (सन्निपातज छोड़कर)साध्य (सन्निपातज छोड़कर)
चिकित्साघृतपान → शोधन → शमनघृतपान → शोधन → शमन

46. आयु के अनुसार निरूह बस्ती का वर्णन

निरूह बस्ति की मात्रा (ch.si.3):
आयु समूहमात्राविशेष
1-5 वर्ष3-4 प्रसृतबहुत सावधानी से
5-12 वर्ष4-6 प्रसृतहल्की बस्ति
12-16 वर्ष6-8 प्रसृतमध्यम
16-70 वर्ष8-12 प्रसृतपूर्ण मात्रा
70-80 वर्ष6-8 प्रसृतघटी हुई
80+ वर्ष4-6 प्रसृतअत्यन्त सावधानी
1 प्रसृत = 96 gram approximately

47. स्तन्य रोग - संप्राप्ति, प्रकार एवं चिकित्सा

स्तन्य रोग = Breast diseases (स्तन संबंधी)
विषयविवरण
हेतुदोष प्रकोप, शोक, चिन्ता, अप्रसव
भेदवातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज
संप्राप्तिदोष → स्तन → दुग्ध दूषण
चिकित्सा दोषानुसार:
  • वातज: स्नेहन, बस्ति
  • पित्तज: विरेचन, शीत
  • कफज: वमन, दीपन

48. ग्रहणी की चिकित्सा

परिभाषा: आँत की कमजोरी = जठरशोथ (Sprue/IBS)
विषयविवरण
मूल कारणमन्दाग्नि (Weak digestion)
चिकित्सा सूत्र"अग्नि दीपन प्रधान"
प्रमुख क्रियादीपन → पाचन → शमन
औषधकुटज, बिल्व, मोचरस, धान्यक
योगकुटजारिष्ट, बिल्वादि चूर्ण, ग्रहणी कपाट रस
विशेष:
ग्रहणी का मूल = अग्नि दुर्बलता; पंचकर्म से पहले ग्रहणी को ठीक करना आवश्यक

49. बस्तिनेत्र के दोष लिखिए

बस्ति नलिका के दोष:
दोषकारणपरिणाम
अत्यधिक गहरीनलिका अधिक डालीगुदा के अन्दर घाव
अत्यधिक बाहरनलिका कम डालीबस्ति वापस न आए
टेढ़ी नलिकागलत दिशाएक ओर ही निष्कासन
टूटी नलिकाकमजोर सामग्रीतरल निकलना
अधिक दबावजोर से दबाएँआँतें फट जाएँ
अधिक हल्के सेकम दबावअपूर्ण निष्कासन

50. संसर्जन क्रम का वर्णन (विस्तृत)

संसर्जन = शोधन के बाद उपचार-पथ्य का क्रमिक परिवर्तन
उद्देश्य:
  1. अग्नि को धीरे-धीरे शक्तिशाली बनाना
  2. पाचन शक्ति की पुनर्स्थापना
  3. व्यापत्तियों से बचना
विस्तृत 7-दिनीय संसर्जन:
दिनआहारविधिगुण
1यवागु (2 भाग पानी)पीने योग्य पेयहल्का, सुपाच्य
2यवागु + घृत (1 चम्मच)दोनों समयस्नेह सहित
3खीर (मैदा/चावल)मध्यम गाढ़ास्वास्तिक शक्ति
4दाल + चावल (१:१)सामान्यसन्तुलित
5दाल + चावल + सब्जीसामान्यपौष्टिक
6रोटी + सब्जी + दालनियमितपूर्ण आहार
7+सामान्य पथ्य आहारनियमितसामान्य जीवन
संसर्जन में सावधानियाँ:
  • कभी अचानक भारी भोजन न दें
  • रुई की तरह हल्का रखें
  • अग्नि के अनुसार बढ़ाएँ
  • यदि अपच के लक्षण हों तो पिछले चरण पर लौट जाएँ

51. औषध सेवन का वर्णन

औषध सेवन के नियम:
विषयनियम
समयसूर्योदय के 2-3 घंटे बाद; सूर्यास्त से पहले
अवस्थाभूखे पेट (शूकर खाने के 3 घंटे बाद)
मात्रारोग-शक्ति अनुसार (सामान्य = 1 चम्मच)
वाहनजल, दूध, घृत, शहद (द्रव्य अनुसार)
अनुपानऔषध के तुरंत बाद का पेय
सेवन काल3 दिन न्यूनतम, 7-30 दिन सामान्य
औषध सेवन के समय पथ्य-अपथ्य:
  • आहार = हल्का, सुपाच्य
  • विहार = व्यायाम न करें, व्रत रखें
  • मन = शान्त, संयमित

52. संशोधन के अतियोगजन्य व्यापत्तियों का वर्णन

शोधन (वमन-विरेचन-बस्ति) के अत्यधिक प्रयोग से होने वाले रोग:
व्यापदलक्षणकारणचिकित्सा
दुर्बलताशारीरिक क्षयअत्यधिक शोधनबृंहण चिकित्सा
अग्नि मन्दताअरोचक, अपचपाचन क्षमता कमजोरदीपन योग
मल बंधकब्ज की समस्याअत्यधिक विरेचनस्नेहपान
आधमानपेट फूलनाअपूर्ण शोधनपवन अनुलोमन
शूलपेट में दर्दअत्यधिक वेगवात शमन
रक्तस्त्रावखून आनाऊतक क्षतिरक्त स्तम्भन
गुदभ्रंशगुदा बाहर आनाअत्यधिक निष्कासनपुष्य अनाज, शल्य उपचार

53. तृष्णा के प्रकार एवं चिकित्सा का वर्णन

(पहले दिया गया - प्रश्न 1 देखें)

54. बद्धगुदोदर का वर्णन

परिभाषा: मल बंद होने से पेट फूलना (Constipation with abdominal distension)
विषयविवरण
हेतुकब्ज, सूखा भोजन, वेगावरोध, वात विकोप
लक्षणपेट कठोर, गुदा बंद, वेदना, गैस
दोषवात प्रधान
चिकित्साविरेचन + स्नेहन
औषधएरण्ड तैल, त्रिफला, आसव-अरिष्ट

55. मदात्यय के चरणों की व्याख्या

मद का अतिसेवन = मदात्यय (5 अवस्थाएँ)
अवस्थासमयनामलक्षण
1तत्कालआलस्यहल्का नशा, चेतना रहती है
21-2 घ.विमोहभ्रम, गति अस्थिर
32-3 घ.स्वप्नअर्धचेतना, सपने जैसी अवस्था
43-4 घ.प्रलयपूरी बेहोशी, गतिहीन
5अधिकमहाप्रलयमृत्यु की अवस्था

56. विषमज्वर की चिकित्सा सहित व्याख्या

विषम ज्वर = Intermittent fever (अलग-अलग दिनों में आना)
प्रकारदिनबुखारचिकित्सा
अर्धावभेदिकाहर 2 दिनमलेरिया जैसाविरेचन + कुइन
तृतीयकाहर 3 दिनहल्काविरेचन + शमन
चतुर्थकाहर 4 दिनऔर हल्कागुणयोग + रसायन
सामान्य चिकित्सा:
अदरक, हल्दी, शहद, गिलोय, सुदर्शन चूर्ण

57. प्रमेह चिकित्सा सूत्र की व्याख्या करते हुए मध्यासव के बारे में

प्रमेह चिकित्सा सूत्र:
रोगीचिकित्सा
स्थूल प्रमेहीशोधन (वमन+विरेचन+बस्ति)
कृश प्रमेहीबृंहण (पोषण+स्नेहन)
मध्यासव:
बीच का रास्ता = जब न तो पूरी स्थूलता हो, न ही अधिक कृशता हो
  • विधि: हल्का शोधन → बृंहण → शमन
  • औषध: मेथी, करेला, हल्दी, निम् का संयोजन

58. धमार्गव कल्प का वर्णन

द्रव्य: धामार्गव (Luffa cylindrica - bitter ridge gourd)
विषयविवरण
उपयोगी अंगफल
कल्पनाक्षीरयोग, सुरायोग, अन्नयोग
संकेतबलवान रोगी में पाण्डु, उदर, गुल्म
अवस्थानिरूह कल्पना में विशेष

59. आचार रसायन का वर्णन

रसायन का आचार सदा के लिए = आचार रसायन
विषयविवरण
अर्थजीवन भर की आचार-नीति जो आयु बढ़ाए
नियमनित्य सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, गुरु भक्ति
लाभदीर्घायु, मेधा, ओजस्
विशेषसर्वश्रेष्ठ रसायन = आचार ही है
कथन"आचारः परमो रसायनः"
परिणाम: आचार + औषधीय रसायन = सर्वोत्तम दीर्घायुत्व

60. आनाह में एरण्ड तैल का प्रयोग

आनाह = Bloating / Gas problem
विषयविवरण
कारणवायु संचय, विरुद्ध भोजन, अग्नि मन्दता
लक्षणपेट फूला, वेदना, गैस
एरण्ड तैलगुण = उष्ण, स्निग्ध, विरेचक
प्रयोग1-2 चम्मच गुनगुने दूध में रात्रि को
परिणामसुबह सुगम मल निष्कासन
परिणतिआनाह-कब्ज समाप्त
विशेष: एरण्ड तैल = विरेचन द्रव्यों का तैल-वर्ग में श्रेष्ठ

परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण बिन्दु

सूत्र-आधार (Memory Aids):

  1. "लंघनं परमौषधम्" = ज्वर में (च.चि.3)
  2. "बस्तिरर्धं चिकित्सायाः" = बस्ति = आधी चिकित्सा (च.सि.1)
  3. "आचारः परमो रसायनः" = आचार सर्वश्रेष्ठ रसायन
  4. "त्रिवृन्मूलं विरेचनानां श्रेष्ठम्" = त्रिवृत = विरेचन का श्रेष्ठ
  5. "ग्रहणी = अग्नि दीपन" = मूलोपचार

परीक्षा में आने वाले विषय (Priority Order):

सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण (100% पूछे जाते हैं):
  • वमन-विरेचन-बस्ति के भेद, लक्षण
  • संसर्जन क्रम
  • पंचकर्म का क्रम
  • निदान (तृष्णा, गुल्म, कुष्ठ)
बहुत महत्त्वपूर्ण (80% पूछे जाते हैं):
  • कल्प (त्रिवृत, मदनफल आदि)
  • उन्माद, अपस्मार, हिक्का
  • त्रिमर्म रोग
  • वातव्याधि
महत्त्वपूर्ण (50-60% पूछे जाते हैं):
  • व्यापद और उनका निवारण
  • आयु अनुसार बस्ति
  • रसायन (च्यवनप्राश आदि)

अंतिम टिप्पणी: यह व्यापक संग्रह BAMS, MD, AIAPGET परीक्षाओं के लिए अत्यावश्यक है। सभी 60+ प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दिए गए हैं। विस्तृत अध्ययन के लिए चरक संहिता के मूल ग्रंथ का अवलोकन अनिवार्य है।

यह एक विस्तृत प्रश्न-सूची है जिसमें 60+ विषय हैं। सभी का संक्षिप्त एवं परीक्षा-उपयोगी वर्णन प्रस्तुत करता हूँ। **Searching sources...**सभी प्रश्नों के उत्तर नीचे क्रमशः प्रस्तुत हैं: --- # चरक संहिता - परीक्षा उपयोगी सम्पूर्ण उत्तर-संकलन --- ## 1. तृष्णा के प्रकार एवं सम्प्राप्ति **परिभाषा:** जिस रोग में अत्यधिक जल पीने की इच्छा हो = तृष्णा **भेद (6 प्रकार):** | क्र. | प्रकार | विशेष लक्षण | |-----|--------|-------------| | 1 | वातज | कण्ठशोष, मुखशोष, शीत पेय इच्छा | | 2 | पित्तज | दाह, अम्लोद्गार, पीत मूत्र | | 3 | कफज | मुखलेप, हृल्लास, मधुर मुख | | 4 | क्षयज | धातुक्षय जन्य; कृश काया | | 5 | आमज | आम के कारण; अरुचि, अजीर्ण | | 6 | उपसर्गज | अन्य रोग में गौण तृष्णा | **सम्प्राप्ति:** > रूक्ष-उष्ण-लवण आहार → पित्त+वात प्रकोप → **आम्बुवहस्रोतस** का शोष → अत्यधिक जलपान इच्छा --- ## 2. तृष्णा की चिकित्सा | दोष | चिकित्सा | |-----|---------| | वातज | स्नेहन + मधुर-अम्ल पेय | | पित्तज | शीत पेय + चन्दन, उशीर, धान्यक | | कफज | उष्ण + तीक्ष्ण पेय; वमन | | क्षयज | बृंहण + द्राक्षा, शर्करा | | आमज | पाचन + लंघन | **प्रमुख योग:** उशीरासव, चन्दनासव, धान्वन्तर घृत, कुसुमाकर रस --- ## 3. विष की वेगानुसार चिकित्सा (च.चि.23) **विष के वेग (क्रमिक अवस्था):** | वेग | अवस्था | लक्षण | चिकित्सा | |-----|--------|-------|---------| | **1st वेग** | शरीर में प्रवेश | लालिमा, दाह | **तत्काल वमन** | | **2nd वेग** | रक्त में | स्फोट, शोथ | **रक्तमोक्षण + विरेचन** | | **3rd वेग** | मांस में | शोथ, पाक | **लेप + रोपण** | | **4th वेग** | मेद में | पिच्छिल, गुरुत्व | **दीपन + पाचन** | | **5th वेग** | अस्थि में | अस्थि वेदना | **तिक्त घृत + बस्ति** | | **6th वेग** | मज्जा में | मूर्च्छा, भ्रम | **मज्जा पोषण + रसायन** | | **7th वेग** | शुक्र तक | नपुंसकता | **वाजीकरण** | **सामान्य विष चिकित्सा सूत्र:** 1. **आशु** (शीघ्र) वमन 2. विरेचन 3. रक्तमोक्षण 4. शोधन 5. शमन (अगद योग) **प्रमुख अगद (Antidotes):** - **सर्पविष** - तण्डुलोदक, मयूरपित्त, महागद - **कीटविष** - मधु + सर्पिः - **स्थावरविष** - शिलाजीत, हरिद्रा --- ## 4. मद का अवस्थानुसार वर्णन (च.चि.24) **मद = उचित मात्रा में मद्यपान (Normal intoxication)** **मदात्यय = अत्यधिक मद्यपान (Alcoholism)** **मद की 3 अवस्थाएँ:** | अवस्था | लक्षण | विशेष | |--------|-------|-------| | **प्रथम (Mild)** | नेत्र रक्तिमा, हर्ष, गीत-हास्य, वाचालता | **मद = पेय** अवस्था | | **द्वितीय (Moderate)** | लड़खड़ाहट, मूर्च्छा प्रायः, वर्चस्व-मूत्र असंयम | **अर्धमूर्च्छित** | | **तृतीय (Severe)** | पूर्ण मूर्च्छा, अचेतना, मृत्युतुल्य | **मूर्च्छा/निद्रा** | **मदात्यय के 4 भेद:** - वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज **चिकित्सा:** - प्रथम अवस्था: धूम, उद्वर्तन - द्वितीय: शीत जलसेक, नस्य, वमन - तृतीय: पंचकर्म, रसायन, मद्यत्याग --- ## 5. मूत्राश्मरी का वर्णन (च.चि.26 / त्रिमर्मीय) **परिभाषा:** मूत्रवाहिनी/मूत्राशय में पथरी = **अश्मरी** **भेद (4 प्रकार):** | प्रकार | रंग/आकार | द्रव्य | |--------|----------|-------| | **वातज** | कृष्ण, खुरदरी | - | | **पित्तज** | पीत, मृदु | - | | **कफज** | श्वेत, चिकनी | - | | **शुक्राश्मरी** | शुक्र से | सफेद | **लक्षण:** - बस्ति-प्रदेश में शूल - मूत्रकृच्छ्र, रक्तमूत्र - मूत्र में बालू जैसा **सम्प्राप्ति:** > कफ + मूत्र का संघनन → मूत्रवह स्रोतस में अवरोध → **अश्मरी** **चिकित्सा:** | विधि | योग | |------|-----| | भेषज | पाषाणभेद, वरुण, गोक्षुर, पुनर्नवा | | छेदन | शस्त्रकर्म (यदि भेषज से न हो) | | उत्तरबस्ति | तैलबस्ति - पथरी को नरम करना | | योग | वरुणादि क्वाथ, गोक्षुरादि चूर्ण | --- ## 6. उरुस्तम्भ का निदान एवं सम्प्राप्ति (च.चि.27) **परिभाषा:** जाँघों में जकड़न/कठोरता = **उरुस्तम्भ** **निदान (कारण):** - स्नेह, दुग्ध, दधि का अति सेवन - अव्यायाम, दिन में शयन - ठण्डे पानी का अति सेवन - कफ-वात प्रकोपक आहार-विहार **सम्प्राप्ति:** > कफ-वात प्रकोप → उरु प्रदेश में **कफ का स्थान** में स्थिति → अभिष्यन्द → **उरु में जकड़न/स्तम्भन** **विशेष:** उरुस्तम्भ = **कफ-वात** प्रधान; **स्नेह के अत्यधिक सेवन** से उत्पन्न --- ## 7. उरुस्तम्भ के प्रकार एवं चिकित्सा **चिकित्सा का विशेष सिद्धान्त:** > **"उरुस्तम्भे रूक्षण प्रधान"** - स्नेहन वर्जित! | विधि | योग | |------|-----| | रूक्षण | यव, त्रिफला, गुग्गुलु | | लंघन | उपवास + लघु आहार | | स्वेदन | रूक्ष स्वेद (बालुका स्वेद) | | विरेचन | त्रिफला विरेचन | | व्यायाम | उरु को बल देना | > **परीक्षा विशेष:** उरुस्तम्भ में **स्नेहन हानिकर** क्योंकि कफवर्धक है। --- ## 8. वातरक्त की सम्प्राप्ति एवं भेद (च.चि.29) **परिभाषा:** वात + रक्त का एक साथ दूषण **निदान:** - विरुद्ध आहार (लवण+अम्ल+उष्ण का अति सेवन) - दिन में शयन - व्यायाम का अभाव - क्रोध, शोक **सम्प्राप्ति:** > विरुद्ध आहार → **रक्त दुष्टि** (पित्त से) + **वात प्रकोप** → दोनों एक-दूसरे को आवृत करते हैं → **वातरक्त** > वात = रक्त द्वारा आवृत → वात का अनुलोम गति अवरुद्ध → **पादादि में वेदना** **भेद:** | प्रकार | स्थान | लक्षण | साध्यता | |--------|-------|-------|---------| | **उत्तान** | त्वक्-मांस (Superficial) | त्वचा में कण्डू, दाह, स्फोट | **साध्य** | | **गम्भीर** | अस्थि-मज्जा (Deep) | अस्थि-वेदना, शोथ, जोड़ों में | **कष्टसाध्य** | --- ## 9. वातरक्त का निदान **हेतु:** - लवण-अम्ल-कटु-उष्ण का अति सेवन - अजीर्ण में भोजन - विरुद्ध आहार - दिवास्वप्न, वेगावरोध **पूर्वरूप:** - पादयोः कण्डू, दाह - त्वचा में रंग परिवर्तन - सन्धियों में भारीपन **रूप (लक्षण):** - सन्धिशूल (joint pain) - शोथ, दाह, कण्डू - त्वग्वर्ण विकृति **उपशय:** शीत स्पर्श, तिक्त-मधुर आहार --- ## 10. श्यामा त्रिवृत कल्प का वर्णन (च.क.7) **द्रव्य:** **त्रिवृत** (Operculina turpethum) | विषय | विवरण | |------|--------| | **पर्याय** | त्रिवृत, श्यामा, त्रिभण्डी, रोचनी | | **वानस्पतिक नाम** | Operculina turpethum | | **कुल** | Convolvulaceae | | **उपयोगी अंग** | **मूल (Root)** | | **श्रेष्ठता** | **"मूलेषु त्रिवृत् श्रेष्ठा"** | | **गुण** | उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म | | **कर्म** | **विरेचन** (श्रेष्ठ) | | **भेद** | श्यामा (काली) = श्रेष्ठ; श्वेता (सफेद) | **प्रमुख कल्प:** - त्रिवृत + क्षीर (दूध) = श्रेष्ठ विरेचन - त्रिवृत + शर्करा - त्रिवृत + घृत - त्रिवृत लेह - त्रिवृतादि चूर्ण **संकेत:** कुष्ठ, पाण्डु, गुल्म, उदर, शोथ, विसर्प --- ## 11. त्रिविध शुद्धि के लक्षण एवं संसर्जन क्रम ### त्रिविध शुद्धि (3 प्रकार की शुद्धि) | शुद्धि | लक्षण | अवधि | |--------|-------|-------| | **प्रवर (उत्तम) शुद्धि** | वमन - 8 वेग; विरेचन - 30 वेग | अधिक शोधन | | **मध्यम शुद्धि** | वमन - 6 वेग; विरेचन - 20 वेग | सामान्य | | **अवर (निम्न) शुद्धि** | वमन - 4 वेग; विरेचन - 10 वेग | अल्प शोधन | **सम्यक् शुद्धि के लक्षण:** - हृदय, श्रोत्र, इन्द्रियों की शुद्धि - लाघव (हल्कापन) - भूख लगना - रोग उपशम - मन की प्रसन्नता ### संसर्जन क्रम (Post-shodhana Diet) **उद्देश्य:** शोधन के बाद दुर्बल अग्नि को क्रमशः बढ़ाना | दिन | आहार | विशेषता | |-----|------|---------| | **1 दिन** | **पेया** (पतली चावल की घोल) | तरल, लघु | | **2 दिन** | **वेसवार** (दलिया जैसा) | अर्ध-तरल | | **3 दिन** | **यूष** (दाल का पानी) | पतला | | **4 दिन** | **युष** (गाढ़ी दाल) | सान्द्र | | **5 दिन** | **कृतान्न** (सामान्य भात) | ठोस | | **6 दिन** | सामान्य आहार | पूर्ण | > **अवर शुद्धि** - 3 दिन; **मध्यम** - 5 दिन; **प्रवर** - 7 दिन संसर्जन --- ## 12. अष्ट महादोषकर भाव **परिभाषा:** 8 ऐसे कार्य जो सर्वाधिक दोष करते हैं | क्र. | भाव | विवरण | |-----|-----|-------| | 1 | **अध्यशन** | अजीर्ण में भोजन | | 2 | **विषमाशन** | अनियमित मात्रा में भोजन | | 3 | **विरुद्धाशन** | विरुद्ध आहार | | 4 | **विपक्वाशन** | कच्चा अन्न खाना | | 5 | **अहित आशन** | अहितकर आहार | | 6 | **अकाल भोजन** | असमय भोजन | | 7 | **अदेश आशन** | अयोग्य स्थान पर भोजन | | 8 | **अपरिमित आशन** | अत्यधिक मात्रा में भोजन | > ये **8 भाव** नव रस-रक्त-मांसादि सभी धातुओं को दूषित करते हैं। --- ## 13. शिरोविरेचन के प्रकार एवं अयोग्य रोगी **शिरोविरेचन = नस्य कर्म** (नासिका द्वारा औषध देना) **नस्य के प्रकार:** | प्रकार | विवरण | संकेत | |--------|-------|-------| | **नावन नस्य** | क्वाथ/तैल नस्य | शिरोरोग सामान्य | | **अवपीड नस्य** | रस निचोड़कर | कफज शिरोरोग | | **धूम नस्य** | धूम द्वारा | कफज रोग | | **प्रतिमर्श नस्य** | नित्य प्रयोग (अल्प) | स्वस्थ में | | **मर्श नस्य** | अधिक मात्रा | रोगी में | **नस्य की मात्रा:** - अवर - 4 बिन्दु - मध्यम - 6 बिन्दु - उत्तम - 8 बिन्दु ### शिरोविरेचन हेतु **अयोग्य रोगी:** - नवप्रसूता (नई माँ) - गर्भिणी - अति बाल/वृद्ध - भुक्तवान् (अभी भोजन किया हो) - तृषित/क्षुधित - मदिरापान के बाद - स्नान के बाद - वर्षाकाल में - श्वास-हिक्का में - रात्रि में --- ## 14. नस्य कर्म का वर्णन **परिभाषा:** > नासिका द्वारा औषध का प्रयोग = **नस्य** > **"नासा हि शिरसो द्वारम्"** - नाक = शिर का द्वार **नस्य के 5 प्रकार:** | प्रकार | मात्रा | कर्म | |--------|--------|------| | नावन (Nasya) | 4-8 बिन्दु | शिरोरोग | | अवपीड | रस - 4-8 बिन्दु | कफ निकासन | | धूम नस्य | धूम | कफशमन | | प्रतिमर्श | 2 बिन्दु (daily) | स्वास्थ्यरक्षण | | मर्श | 4-8 बिन्दु | रोगनाशन | **नस्य विधि:** 1. स्नेहन-स्वेदन (पूर्वकर्म) 2. सिर नीचे करके नासिका में औषध 3. कवलग्रह (गरारा) 4. धूमपान 5. स्नेहन (पश्चात्कर्म) **संकेत:** शिरोरोग, अर्दित, पक्षाघात, कर्णरोग, नेत्ररोग, अपस्मार --- ## 15. हृदयरोग के प्रकार एवं लक्षण (च.सि.9) **भेद (5 प्रकार):** | प्रकार | लक्षण | चिकित्सा | |--------|-------|---------| | **वातज** | कम्पन, वेदना, हृदय में रिक्तता अनुभव | स्नेहन + बस्ति | | **पित्तज** | दाह, मूर्च्छा, पीतवर्ण | विरेचन + शीत | | **कफज** | भार, मन्दता, अरोचक | वमन + दीपन | | **त्रिदोषज** | मिश्र लक्षण | कठिन | | **कृमिज** | विचित्र वेदना, वमन, छींक | कृमिघ्न + शोधन | **सामान्य लक्षण:** - हृदय में शूल/वेदना - हृदय में भारीपन - श्वास, भ्रम, मूर्च्छा - हृदय में कम्पन **कृमिज हृदयरोग की विशेषता:** - मन में भय - रात्रि में अधिक वेदना - खट्टी-कड़वी वस्तुओं में रुचि --- ## 16. अपस्मार का वर्णन (च.नि.8, च.चि.10) **भेद (4 प्रकार):** | प्रकार | लक्षण | साध्यता | |--------|-------|---------| | **वातज** | कृष्णदर्शन, फेन, अल्पकाल | साध्य | | **पित्तज** | पीतदर्शन, दाह, स्वेद | साध्य | | **कफज** | श्वेतदर्शन, कफस्राव, दीर्घकाल | साध्य | | **सन्निपातज** | मिश्र | **असाध्य** | **सम्प्राप्ति:** > दोष प्रकोप → हृदय आवरण → **ओजस् का विकृति** → मनोवहस्रोतस दूषण → **स्मृतिभ्रंश + आक्षेप** **लक्षण:** - मूर्च्छा (चेतनानाश) - आक्षेप (Convulsions) - फेन (foaming) - दन्तकटकट - दृष्टि विकृति - होश आने पर विस्मरण **चिकित्सा सूत्र:** > शोधन (नस्य + वमन + विरेचन) → **शमन** → रसायन **प्रमुख योग:** पञ्चगव्य घृत, वचातैल (नस्य), सारस्वत चूर्ण, ब्राह्मी, सर्पगन्धा --- ## 17. उन्माद का वर्णन एवं उन्माद-अपस्मार में अन्तर (च.नि.7, च.चि.9) **उन्माद के 5 भेद:** | प्रकार | लक्षण | |--------|-------| | वातज | अनियमित चेष्टा, हँसना-रोना बिना कारण | | पित्तज | क्रोध, अस्त्र ग्रहण, नग्नता | | कफज | मौन, एकान्त, स्वप्नशीलता | | सन्निपातज | मिश्र - **असाध्य** | | आगन्तुज | अचानक, देव-भूत आवेश | ### उन्माद एवं अपस्मार में अन्तर | विषय | उन्माद | अपस्मार | |------|--------|---------| | **चेतना** | विकृत किन्तु होश रहता है | पूर्ण चेतनानाश | | **आक्षेप** | नहीं | होता है | | **फेन** | नहीं | होता है | | **अवधि** | स्थायी | वेग में आता-जाता | | **स्मृति** | विकृत | वेग के बाद विस्मरण | | **भेद** | 5 | 4 | | **स्थान** | च.नि.7, च.चि.9 | च.नि.8, च.चि.10 | **चिकित्सा:** > घृतपान → वमन → विरेचन → नस्य → शिरोबस्ति → ब्राह्मी, पञ्चगव्य घृत --- ## 18. विसर्प के प्रकार एवं साध्य-असाध्यता (च.चि.21) **परिभाषा:** तेजी से फैलने वाला त्वचाविकार **भेद (7 प्रकार):** | प्रकार | लक्षण | साध्यता | |--------|-------|---------| | 1. वातज | रूक्ष, श्याव, वेदना | साध्य | | 2. पित्तज | पीत, दाह, पाक | साध्य | | 3. कफज | श्वेत, स्निग्ध, कण्डू | साध्य | | 4. वातपित्तज | मिश्र | कृच्छ्रसाध्य

आपने पिछले उत्तर को आगे बढ़ाने के लिए भेजा है। शेष प्रश्नों के उत्तर नीचे क्रमशः प्रस्तुत हैं:

18. विसर्प के प्रकार एवं साध्य-असाध्यता (शेष)

भेद (7 प्रकार) - पूर्ण:
प्रकारलक्षणसाध्यता
वातजरूक्ष, श्याव, वेदनासाध्य
पित्तजपीत, दाह, पाकसाध्य
कफजश्वेत, स्निग्ध, कण्डूसाध्य
वातपित्तजमिश्र - दाह + वेदनाकृच्छ्रसाध्य
वातकफजस्निग्ध + वेदनाकृच्छ्रसाध्य
पित्तकफजपाक + कण्डूकृच्छ्रसाध्य
सन्निपातजमिश्र - तीव्रअसाध्य
असाध्य विसर्प के लक्षण:
  • मर्म स्थान पर फैला हो
  • 10 वर्ष से पुराना
  • सन्निपातज प्रकार
चिकित्सा: विरेचन + रक्तमोक्षण + महातिक्त घृत + नीम तैल लेप

19. विरेचन के योग्य, अयोग्य एवं सम्यक् विरेचन लक्षण

योग्य (Indications):
  • पित्तज विकार (कुष्ठ, पाण्डु, उदर, विसर्प)
  • आयु 16-70 वर्ष
  • बलवान शरीर
  • सम्यक् स्नेहन-स्वेदन के बाद
अयोग्य (Contraindications):
वर्गविशेष
आयुशिशु (<5 वर्ष), अतिवृद्ध (>80 वर्ष)
अवस्थागर्भिणी, रजस्वला, प्रसवोत्तर
रोगअतिसार, गुदभ्रंश, बवासीर (रक्तस्रावी)
स्थितिवातरोगी (केवल), क्षीण, दुर्बल
सम्यक् विरेचन के लक्षण:
विषयउत्तममध्यमअवर
वेग संख्या302010
क्रमकफ → पित्त → पित्तजल
परिणामरोग उपशम + लाघव
अग्निदीपन होती है
अतियोग चिकित्सा: यवागु + मधु + बिल्व (स्तम्भन) अयोग चिकित्सा: पुनः विरेचन दोबारा दें

20. च्यवनप्राश का वर्णन (च.चि.1)

श्रेष्ठ रसायन आवलेह
मुख्य घटक:
घटकमात्राकर्म
आमलकी (मुख्य)सर्वाधिकरसायन, धात्री
पिप्पलीमध्यमदीपन, वातशमन
शर्करापर्याप्तमधुर, बृंहण
घृतस्नेहन
शहदअनुपान
अश्वगन्धाबलवर्धन
शतावरीरसायन
बलावातशमन
गुण-कर्म:
  • सर्व रोग नाशक
  • बालक, वृद्ध, युवा सभी हेतु
  • दीर्घायु, स्मृति, बल, वीर्यवर्धक
मात्रा एवं अनुपान:
1-2 चम्मच + दूध/जल; प्रातः-सायं
विशेष:
"च्यवनस्य यथाप्रोक्तो रसायनविधिः" - च्यवन ऋषि के लिए तैयार = च्यवनप्राश

21. आवरण का वर्णन (च.चि.28)

परिभाषा:
एक दोष द्वारा दूसरे दोष या धातु का आच्छादन = आवरण
प्रकार:
आवरणआवृतआवारक
वातावृत वातवातवात स्वयं
कफावृत वातवातकफ
पित्तावृत वातवातपित्त
आमावृत अग्निअग्निआम
धात्वावरणधातुदोष
आमावरण = सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण:
आम → अग्नि का आवरण → अग्नि मन्द → सर्व रोग उत्पत्ति
लक्षण:
  • अरोचक, अपच
  • जिह्वा पर लेप
  • मल में आम की उपस्थिति
  • ज्वर (आमज)
चिकित्सा:
दीपन-पाचन (आम पाचन) → दोषावरण हटाओ → शमन त्रिकटु, चित्रक, शुण्ठी, हिंग्वाष्टक

22. हिक्का के प्रकार, लक्षण एवं साध्य-असाध्यता (च.चि.17)

हिक्का (Hiccup) के 5 भेद:
प्रकारलक्षणसाध्यता
अन्नजाभोजन के बाद; स्वतः शान्तसाध्य (स्वयं ठीक)
यमलायुगल-हिचकी; थोड़ी देरसाध्य
गम्भीरागहरी, तीव्र ध्वनि; काफी देरकष्टसाध्य
क्षुद्राछोटी-छोटी, सूक्ष्मसाध्य
महती (महाहिक्का)अत्यन्त तीव्र, शरीर हिलाने वालीअसाध्य
असाध्य हिक्का के संकेत:
  • 10 दिन से अधिक पुरानी
  • शरीर अत्यन्त क्षीण हो
  • सन्निपातज हो
  • महाहिक्का का भेद हो
सामान्य चिकित्सा:
  • वमन + धूमपान + नस्य
  • श्वासकुठार रस, कनकासव, शिरीष

23. विरेचन व्यापद का वर्णन (च.सि.6)

7 प्रकार की विरेचन व्यापद:
व्यापदकारणलक्षणचिकित्सा
अतियोगअधिक विरेचन30+ वेग, दुर्बलता, परिस्रावस्तम्भन (कुटज, बिल्व, मधु+शर्करा)
अयोगकम विरेचन5-6 वेग, रोग नहीं गयाविरेचन पुनः दें
मिथ्यायोगअनुचित विधिअपूर्ण, दुष्परिणामसुधार + उपाय
परिस्रावनलिका क्षतिरक्त+श्लेष्मरक्तस्तम्भन
क्षीणताअत्यधिक वेगअत्यन्त कृशताबृंहण + रसायन
आधमानवायु रुकनापेट फूलनापवन अनुलोमन
पक्वाशयदाहतीव्र विरेचनआँत में दाहशीत + घृत
अतियोग = सर्वाधिक खतरनाक:
मृत्यु की सम्भावना; तत्काल स्तम्भन चिकित्सा आवश्यक

24. उदर रोग का सम्पूर्ण वर्णन (च.चि.13)

परिभाषा: उदर का अस्वाभाविक वृद्धि = उदर (Ascites/Abdominal disease)
8 प्रकार:
प्रकारहेतुलक्षणसाध्यता
वातोदरवातपेट कठोर, शूल, गैससाध्य
पित्तोदरपित्तदाह, पीततासाध्य
कफोदरकफशीतल, कठोर, भारसाध्य
सन्निपातोदरसन्निपातमिश्रकृच्छ्रसाध्य
प्लीहोदरप्लीहाबायीं शोथकृच्छ्रसाध्य
बद्धोदरमल बंधमल-मूत्र बंदसाध्य
आगन्तुजोदरआघातअचानक शोथविषय पर निर्भर
क्षतजोदरआघात+क्षतगम्भीरकष्टसाध्य
जलोदर (Ascites) = गम्भीर:
अवस्था - पेट में जल संचय
चिकित्सा सूत्र:
"गोमूत्रं सर्वोदरेषु श्रेष्ठम्"
  • गोमूत्र + पुनर्नवा = मूत्रल
  • विरेचन (पित्तोदर)
  • वमन (कफोदर)
प्लीहोदर चिकित्सा:
रोहितकारिष्ट + त्रिफला + विरेचन

25. ज्वर में घृतपान का महत्व

घृत का उपयोग ज्वर में = विशेष स्थिति में:
स्थितिकब घृत देंकब न दें
शोधन से पूर्वदोषों को मृदु बनानेतीव्र ज्वर में
जीर्ण ज्वरबृंहण हेतुआम ज्वर में
दाहयुक्त ज्वरशान्ति हेतुकफज ज्वर में
घृत के लाभ ज्वर में:
  1. दोषों को स्निग्ध करना
  2. आमाशय की रक्षा
  3. विरेचन की सुगमता
  4. पोषण = बृंहण कर्म
"विरेचनाय घृतपानं ज्वरे श्रेष्ठम्" = ज्वर में विरेचन से पूर्व घृतपान श्रेष्ठ है

26. प्रमेह चिकित्सा सूत्र की व्याख्या + मध्यासव

मूल सूत्र:
रोगीचिकित्साकारण
स्थूल प्रमेहीशोधन (वमन+विरेचन+बस्ति)मेद = अधिक, शोधन उचित
कृश प्रमेहीबृंहण (पोषण+स्नेहन)धातु क्षीण, बृंहण उचित
मध्यासव (Middle path):
न अत्यन्त स्थूल, न अत्यन्त कृश = मध्यम शरीर
मध्यम प्रमेही की चिकित्सा:
  • दीपन-पाचन प्रधान
  • हल्का लंघन
  • आहार नियन्त्रण = यव, जौ, करेला, जामुन
  • औषध = शिलाजीत, हरिद्रा, आमलकी, निम्ब, गुडूची
  • चन्द्रप्रभावटी = सर्वोत्तम योग

27. धामार्गव कल्प का वर्णन (च.क.4)

विषयविवरण
द्रव्यधामार्गव (Luffa cylindrica - bitter/wild variety)
वानस्पतिक नामLuffa cylindrica
उपयोगी अंगफल (Fruit)
कर्मवमन
भेदधामार्गव के अनेक कल्प
प्रमुख कल्प:
कल्पसामग्री
क्षीरयोगधामार्गव + दूध
सुरायोगधामार्गव + मद्य
अन्नयोगधामार्गव + चावल
नस्ययोगनस्य के रूप में
मात्रायोगअकेले उचित मात्रा
लेहयोगलेह के रूप में
संकेत:
  • बलवान रोगी में पाण्डु, उदर, गुल्म
  • कुष्ठ, प्लीहोदर

28. आचार रसायन का वर्णन (च.चि.1)

परिभाषा:
जो आचार-व्यवहार दीर्घायु + स्वास्थ्य प्रदान करे = आचार रसायन
आचार रसायन के नियम:
विषयनियम
वाणीसत्य वचन, मधुर भाषण
मनक्रोध-लोभ-ईर्ष्या का त्याग
क्रियाअहिंसा, गुरुसेवा, दान
आहारहित-मित-कालोचित आहार
विहारब्रह्मचर्य, योग, ध्यान
सेवादेव, गौ, ब्राह्मण सेवा
फल:
दीर्घायु, मेधा, ओजस्, बल, वर्ण, कीर्ति
विशेष उद्धरण:
"आचारः परमो धर्मः" - आचार सर्वोत्तम धर्म है
परीक्षा में अक्सर पूछते हैं: "सर्वश्रेष्ठ रसायन कौन है?" उत्तर = आचार रसायन

29. आनाह में एरण्डतैल का प्रयोग

आनाह = वायु का अनुलोम न होना = गैस/Bloating
एरण्डतैल (Castor oil) का उपयोग:
विषयविवरण
गुणउष्ण, स्निग्ध, तीक्ष्ण, विरेचन
मात्रा10-15 ml (2 चम्मच)
अनुपानगुनगुना दूध
समयरात्रि में सोने से पहले
कर्ममल को मृदु करना + वायु अनुलोमन
विशेष"तैलेषु एरण्डतैलं श्रेष्ठम्" = तैल-वर्ग में श्रेष्ठ
आनाह की चिकित्सा (क्रम):
  1. एरण्डतैल सेवन
  2. स्नेहन + स्वेदन
  3. बस्ति (वातशमन)
  4. हिंग्वाष्टक चूर्ण + गरम जल

30. शुक्रदोष का वर्णन (च.चि.30)

8 प्रकार की शुक्र विकृतियाँ:
प्रकारलक्षणकारणचिकित्सा
पूति शुक्रदुर्गन्धसंक्रमणशोधन + दुग्ध
रक्त शुक्ररक्त-मिश्रितपित्त विकोपरक्तशमन
श्वेत शुक्रअत्यन्त सफेदकफरूक्षण
पीत शुक्रपीलापित्तविरेचन
ग्रन्थि शुक्रगाँठयुक्तकफकफशमन
फेनिल शुक्रफेनयुक्तवातस्नेहन
तनु शुक्रपतलावातबृंहण
क्षीण शुक्रअल्प/नहींक्षयवाजीकरण
सामान्य चिकित्सा:
अश्वगन्धा, शतावरी, कपिकच्छु, मुसली + दुग्ध

31. छर्दि के प्रकार, लक्षण एवं साध्य-असाध्यता (च.चि.20)

5 प्रकार:
प्रकाररंगस्वादगन्धसाध्यता
वातजरुक्ष, नीलाभखट्टा/कड़वाफेन युक्तसाध्य
पित्तजपीत-हरितकड़वा-चरपरादाहयुक्तसाध्य
कफजश्वेतमधुरचिकनासाध्य
सन्निपातजविचित्रमिश्र-कष्टसाध्य
आगन्तुजविचित्र--कारण पर
असाध्य छर्दि:
  • 10+ दिन की पुरानी
  • अत्यन्त क्षीण रोगी
  • सन्निपातज प्रकार
चिकित्सा:
शुण्ठी + एला + धान्यक + शंखभस्म; दोषानुसार शमन

32. आयु के अनुसार अनुवासन एवं निरूह बस्ति की मात्रा (च.सि.1,3)

अनुवासन बस्ति मात्रा:
आयुमात्राटिप्पणी
1-2 वर्ष1 प्रसृतबहुत अल्प
3-5 वर्ष1.5 प्रसृतअल्प
6-10 वर्ष2-3 प्रसृतमध्यम
11-15 वर्ष3-4 प्रसृतमध्यम+
16-70 वर्ष6 प्रसृत (पूर्ण)पूर्ण मात्रा
71-80 वर्ष3-4 प्रसृतअर्ध
80+ वर्ष1.5-2 प्रसृतअत्यल्प
निरूह बस्ति मात्रा:
अनुवासन की दोगुनी = 12 प्रसृत (वयस्क में)
1 प्रसृत ≈ 96 gram

33. उदावर्त रोग का वर्णन (च.चि.26/त्रिमर्मीय)

परिभाषा:
अपान वायु का ऊपर (उदान की ओर) प्रवाह = उदावर्त
निदान:
  • अपान वेग का धारण (मल-मूत्र-अपान का रोकना)
  • कब्ज, भारी भोजन
  • वेगावरोध + वात विकोप
लक्षण:
  • छाती में जकड़न
  • हिचकी, श्वास
  • पेट में गैस ऊपर
  • उलटी-जैसी अनुभूति
चिकित्सा:
  • वात शमन = बस्ति + स्नेहन
  • अनुलोमन = त्रिफला, हिंग्वाष्टक
  • एरण्डतैल

34. अतत्त्वाभिनिवेश महागद का वर्णन (च.चि.9/उन्माद)

परिभाषा:
अतत्त्व = असत्य/भ्रान्त विषय में; अभिनिवेश = दृढ़ निश्चय अर्थात् जो बात सत्य नहीं है, उसे सत्य मानना और छोड़ न पाना
वर्गीकरण: उन्माद का एक विशेष रूप
लक्षण:
  • गलत धारणाओं में अत्यन्त दृढ़ता (Delusions)
  • तर्क देने पर भी न मानना
  • मन की विकृति
चिकित्सा:
शोधन (वमन+विरेचन+नस्य) → ब्राह्मी घृत + सारस्वत चूर्ण मन की शुद्धि + आश्वासन

35. बस्तिदाता दोष (Basti Giver's faults)

बस्ति देने वाले चिकित्सक के 7 दोष (च.सि.3):
क्र.दोषपरिणामनिवारण
1शीघ्र प्रयोगबस्ति अचानक लगानाधीरे-धीरे
2मन्द प्रयोगबहुत धीरे-धीरेसम गति
3तिरछा प्रयोगएक ओरसीधा प्रयोग
4उच्च धारणबहुत ऊपरसमान स्तर
5नीच धारणबहुत नीचेऊँचाई ठीक करें
6अधिक मात्राअतियोगसही मात्रा
7कम मात्राअयोगसही मात्रा

36. सुधा कल्प का वर्णन (च.क.10)

विषयविवरण
द्रव्यसुधा (Calotropis gigantea / अर्क / मदार)
वानस्पतिक नामCalotropis gigantea
उपयोगी अंगक्षीर (Latex/दूध)
कर्मतीव्र विरेचन
मात्रा2-4 बूँद (⚠️ अत्यधिक सावधानी)
अधिक मात्राविष के समान कार्य करे
प्रमुख कल्प:
कल्पविधि
क्षीरयोगसुधा क्षीर + दूध
तैलयोगसुधा क्षीर + तेल
घृतयोगसुधा क्षीर + घृत
संकेत:
  • जीर्ण कुष्ठ
  • जलोदर (केवल बलवान रोगी)
  • विषम ज्वर

37. महाकुष्ठ के प्रकार एवं सिद्ध कुष्ठ की चिकित्सा

महाकुष्ठ के 7 भेद:
भेदआधारसाध्यता
कापालम्खोपड़ी-त्वचा जैसाकष्टसाध्य
औदुम्बरम्गूलर फल जैसाकष्टसाध्य
मण्डलम्गोलाकारसाध्य
ऋक्षजिह्वम्भालू की जीभ जैसाकष्टसाध्य
पुण्डरीकम्कमल जैसासाध्य
सिध्मम्तेजी से फैलताकष्टसाध्य
कालम्काला कुष्ठअसाध्य
सिद्ध (जीर्ण) कुष्ठ की चिकित्सा:
विधियोग
शोधनवमन + विरेचन (पुनः-पुनः)
शमनखदिरारिष्ट, आरोग्यवर्धिनी, गन्धकरसायन
बाह्यबाकुची तैल, निम्ब तैल
विशेषबाकुची = श्वेत कुष्ठ (Vitiligo) में प्रमुख

38. पाण्डु-कमला की चिकित्सा (च.चि.16)

पाण्डु (Anaemia) - 5 प्रकार:
प्रकारप्रमुख औषध
वातजलौह+वात शामन
पित्तजविरेचन + लौह
कफजवमन + लौह
सन्निपातजशोधन क्रमशः
मृद्भक्षणजमिट्टी खाने से; कृमिघ्न
प्रमुख योग:
नवायस लौह, पुनर्नवा मण्डूर, लौह भस्म, द्राक्षासव
कमला (Jaundice):
विषयविवरण
हेतुपित्त विकोप
लक्षणत्वचा+नयन+मूत्र पीले
चिकित्साविरेचन + भूमि आमलकी
योगरोहितकारिष्ट, भृंगराज, कुमारी

39. फलमात्रा सिद्धि - फलों की रोगानुसार श्रेष्ठता (च.सि.11)

फलकर्मरोग
बिल्वग्राही + दीपनअतिसार, ग्रहणी
हरीतकीअनुलोमन + त्रिदोषघ्नकब्ज, सर्वरोग
आमलकीरसायन + विरेचनपाण्डु, पित्तज रोग
द्राक्षाबृंहण + रक्तप्रसादरक्तपित्त, क्षय
विदारीबृंहण + वातशमनक्षीण, वातव्याधि
अभयासर्वरोगकब्ज से सर्वरोग तक

40. चतुरंगुल कल्प का वर्णन (च.क.8)

विषयविवरण
द्रव्यचतुरंगुल / स्नुही (Euphorbia neriifolia)
अन्य नामथूहर, सेहुण्ड
उपयोगी अंगक्षीर (Latex) - श्रेष्ठ क्षीर विरेचन
श्रेष्ठता"क्षीरेषु स्नुही श्रेष्ठः"
कर्मतीव्र विरेचन
मात्रा2-4 बूँद
कल्प:
कल्पविधि
क्षीरयोगस्नुही क्षीर + दूध
घृतयोगस्नुही क्षीर + घृत
शर्करायोगस्नुही क्षीर + शर्करा
संकेत: जलोदर (बलवान में), उदर, बलवान रोगी

41. जीर्ण ज्वर का वर्णन

परिभाषा: 30 दिन से अधिक = जीर्ण ज्वर (Chronic fever)
विशेष लक्षण:
अवस्थालक्षण
प्रारम्भिकसन्ध्या को ज्वर, प्रातः कम
मध्यस्थायी मन्द ज्वर
जीर्णशरीर अत्यन्त क्षीण
चिकित्सा:
  • शोधन वर्जित (क्षीण है)
  • बृंहण प्रधान:
    च्यवनप्राश, अश्वगन्धा, शतावरी, बला, सितोपलादि
  • रसायन + संशमनी वटी

42. हिक्का-श्वास-कास की तुलना एवं संप्राप्ति

तीनों की संप्राप्ति:
रोगदोषस्रोतससंप्राप्ति
हिक्कावात+कफप्राणवहस्रोतसहृदय+प्राण वायु विकृति → झटकेदार श्वास
श्वासवात+कफप्राणवहस्रोतसउदान+प्राण का अवरोध → कठिन श्वास
काससभी दोषप्राणवहस्रोतसगले में अवरोध → खाँसी
भेद:
  • हिक्का = 5; श्वास = 5; कास = 5
चिकित्सा सूत्र:
रोगसूत्र
हिक्कावमन + धूम
श्वासवमन + नस्य + धूम
कासदोषानुसार; वमन/विरेचन + शमन
असाध्य:
  • हिक्का: महाहिक्का
  • श्वास: महाश्वास, ऊर्ध्वश्वास, छिन्नश्वास
  • कास: क्षयज + रक्तष्ठीवन वाला

43. कमला रोग का वर्णन (च.चि.16)

पाण्डु के बाद कमला = Jaundice (अगली अवस्था)
निदान:
  • पित्त विकोप, विरुद्ध आहार
  • अधिक क्रोध, शोक
लक्षण:
  • त्वचा, नयन, नख, मूत्र = पीला
  • अरोचक, अग्निमन्दता
  • मुख में कड़वाहट
भेद:
  • शाखाश्रित कमला = त्वचा में पित्त (हल्का)
  • कोष्ठाश्रित कमला = आँत में पित्त (गम्भीर)
चिकित्सा:
विधियोग
विरेचनत्रिफला, त्रिवृत
औषधभूमि आमलकी, भृंगराज, रोहितकारिष्ट
आहारजौ, मूंग, गाय का दूध, घृत

44. संसर्जन क्रम - विस्तृत वर्णन (च.सि.2)

6 आहार क्रम (Post-Shodhana):
दिनपर्यायविवरणअग्नि अवस्था
1पेयापतली यवागु (चावल का पानी)अत्यन्त मन्द
2विलेपीगाढ़ी खिचड़ीमन्द
3अक्तयूषघी मिली दालथोड़ी बढ़ी
4अनक्तयूषघी बिना दालमध्यम
5मांसरसहल्का मांस-रसमध्यम+
6सामान्यसामान्य पथ्य आहारसामान्य
अवर शुद्धि = 3 दिन संसर्जन मध्यम शुद्धि = 5 दिन प्रवर शुद्धि = 7 दिन

45. औषध सेवन काल का वर्णन (च.सु.1/भेषज विधि)

10 प्रकार के औषध सेवन काल:
कालविशेषसंकेत
प्राभात (भोर)खाली पेटकृमि, वात विकार
मुहूर्त (भोजन से पहले)कुछ पहलेबल, स्मृति वर्धन
भोजन के साथअन्न के साथरोचन हेतु
अन्नोपरि (बाद में)भोजन के बाददुर्बलता
अन्तरा (बीच-बीच में)ग्रास-ग्रास के बीचहृद्रोग
सामुदग (शुरू-बीच-अन्त)हर चरण मेंहिक्का, श्वास
निशा (रात्रि)सोते समयआँखें, उत्तम नेत्र
सायम् (शाम)शाम कोनेत्र रोग
सा-अन्न (खाने के साथ)मिलाकरअरोचक
प्रभात (सुबह)उठते हीज्वर, पाण्डु

46. संशोधन के अतियोग से व्यापत्तियाँ (च.सि.6)

तीनों शोधन (वमन-विरेचन-बस्ति) के अतियोग से:
शोधनअतियोग लक्षणचिकित्सा
वमन अतियोगअत्यधिक वमन, रक्त वमन, दुर्बलतास्तम्भन = मधु + शर्करा
विरेचन अतियोग30+ वेग, परिस्राव, क्षीणतास्तम्भन = बिल्व + कुटज
बस्ति अतियोगगुदभ्रंश, रक्त, क्षीणताबस्ति रोकना + बृंहण
सामान्य अतियोग चिकित्सा सूत्र:
स्तम्भन → बृंहण → रसायन

47. बद्धगुदोदर का वर्णन

परिभाषा: गुदा बंद होना + पेट फूलना = बद्धगुदोदर (= बद्धोदर)
विषयविवरण
हेतुवेगावरोध, कब्ज, वात विकोप, ठंडा-सूखा आहार
लक्षणकठोर पेट, मल-मूत्र बंद, शूल, गैस
सम्प्राप्तिवात → पक्वाशय + अपान दूषण → मल संचय → उदर वृद्धि
चिकित्साविरेचन + स्नेहन + बस्ति
औषधएरण्डतैल, त्रिफला, हरीतकी, दशमूल

48. मदात्यय के चरणों की व्याख्या (च.चि.24)

4 भेद (दोषानुसार) + 3 अवस्था:
मदात्यय के 3 चरण:
चरणसमयनामलक्षण
1प्रथममदआनन्द, हास्य, गान
2द्वितीयविभ्रमभ्रम, असन्तुलन
3तृतीयमूर्च्छाअचेतावस्था
4 दोषज भेद:
भेदविशेष लक्षणचिकित्सा
वातजकम्पन, बड़बड़ानास्नेहन + बस्ति
पित्तजदाह, क्रोधविरेचन + शीत
कफजनिद्रा, मन्दतावमन + दीपन
सन्निपातजमिश्र लक्षणकठिन

49. विषमज्वर की चिकित्सा

विषम ज्वर = एकान्तर, द्वैतर, तृतीयक, चातुर्थक
प्रकारबुखार का क्रमModern Eq.चिकित्सा
एकान्तरहर दूसरे दिनMalaria (P. vivax)गिलोय + सुदर्शन
तृतीयकहर तीसरे दिनP. malariaeशोधन + शमन
चातुर्थकहर चौथे दिन-गुग्गुल + शोधन
सन्ततलगातारTyphoid जैसाज्वर चिकित्सा
सामान्य चिकित्सा:
  1. लंघन (primary)
  2. पाचन = गिलोय, शुण्ठी, पिप्पली
  3. विरेचन = त्रिफला
  4. शमन = सुदर्शन चूर्ण, संशमनी वटी

50. स्तन्य रोग - संप्राप्ति, प्रकार एवं चिकित्सा

स्तन्य = माँ का दूध; स्तन्य रोग = दूध का विकार
4 प्रकार (दोषानुसार):
प्रकारदूध का विकारचिकित्सा
वातजकड़वा/फेनयुक्तस्नेहन + बस्ति
पित्तजपीत, तीखाविरेचन + शीत
कफजसफेद, गाढ़ावमन + दीपन
सन्निपातजमिश्रक्रमशः शोधन
संप्राप्ति:
माँ का अनुचित आहार → दोष प्रकोप → स्तन्य दूषण → शिशु रोग
चिकित्सा:
माँ को पथ्य आहार + दोषशमन; शतावरी घृत

51. ग्रहणी की चिकित्सा (च.चि.15)

ग्रहणी = IBS / Sprue / Malabsorption
चिकित्सा का मूल सिद्धान्त:
"ग्रहण्यां अग्निचिकित्सा प्रधाना"
4 भेद एवं चिकित्सा:
भेदचिकित्सा
वातजस्नेहन + बस्ति + कुटज
पित्तजविरेचन + बिल्व + धान्यक
कफजवमन + कुटज + अग्निदीपन
सन्निपातज (घाटिका)दीपन + पाचन + तीनों शमन
प्रमुख योग:
कुटजारिष्ट, बिल्वादि चूर्ण, ग्रहणी कपाट रस, पंचामृत लौह

52. आर्दित के लक्षण एवं चिकित्सा

आर्दित = Facial Palsy / Bell's Palsy
लक्षणविवरण
मुख विकृतिमुँह एक ओर टेढ़ा
नेत्रएक आँख बंद न हो
वाणीअस्पष्ट
जिह्वाएक ओर झुकी
नासाएक ओर विकृति
ललाटएक ओर झुर्रियाँ नहीं
निदान:
  • वात प्रकोप, ठण्ड, आघात
चिकित्सा:
तैल नस्य + धूम + स्नेहन + अभ्यंग महारास्नादि तैल, बला तैल

परीक्षा में सर्वाधिक पूछे जाने वाले विशेष बिन्दु

संख्यात्मक तथ्य (Number-based facts):

विषयसंख्या
प्रमेह भेद20
कुष्ठ भेद18 (7+11)
उन्माद भेद5
अपस्मार भेद4
उदर भेद8
विसर्प भेद7
हिक्का भेद5
श्वास भेद5
कास भेद5
छर्दि भेद5
तृष्णा भेद6
मूत्राघात भेद12
योनिव्यापत्20

महत्त्वपूर्ण श्रेष्ठता (Superiority facts):

विषयश्रेष्ठ
वमन द्रव्यों मेंमदनफल
विरेचन द्रव्यों मेंत्रिवृत (मूल)
वल्क-वर्ग मेंतिल्वक
फल-वर्ग मेंहरीतकी
तैल-वर्ग मेंएरण्डतैल
क्षीर-वर्ग मेंस्नुही क्षीर
रसायन मेंच्यवनप्राश
सर्वश्रेष्ठ रसायनआचार रसायन
बस्ति-वर्ग मेंनिरूह बस्ति (शोधन हेतु)

चिकित्सा सूत्र (Treatment maxims):

विषयसूत्र
ज्वर"लंघनं परमौषधम्"
बस्ति"बस्तिरर्धं चिकित्सायाः"
आचार"आचारः परमो रसायनः"
वातव्याधिबस्ति = सर्वश्रेष्ठ
उरुस्तम्भरूक्षण (स्नेहन वर्जित)
ग्रहणीअग्नि दीपन प्रधान
प्रमेहस्थूल = शोधन; कृश = बृंहण
नाक"नासा हि शिरसो द्वारम्"

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1. ग्रहणी ग्रहणी के निदान, संप्राप्ति, प्रकार, लक्षण लिखते हुए चिकित्सा लिखिए। 2. बस्ती बस्ती की निरुक्ति, भेद, मात्रा एवं बस्ती दोष लिखते हुए बस्ती विधि का वर्णन कीजिए। 3. कल्पस्थान / मदनफल कल्पस्थान की निरुक्ति बताते हुए मदनफल के योगों के नाम तथा वमन एवं विरेचन की कार्मुकता का वर्णन कीजिए। 4. योनि व्यापद योनि व्यापद की संप्राप्ति, लक्षण एवं चिकित्सा का वर्णन कीजिए। 5. कमला कमला के निदान, संप्राप्ति, लक्षण एवं चिकित्सा का वर्णन कीजिए। 6. चतुरंगुल / दन्ती / द्रवन्ती कल्प चतुरंगुल कल्प, दन्ती कल्प एवं द्रवन्ती कल्प का वर्णन कीजिए। 7. मूत्रकृच्छ मूत्रकृच्छ के निदान, संप्राप्ति, लक्षण एवं चिकित्सा का वर्णन कीजिए। 8. निरूह बस्ती उपद्रव निरूह बस्ती के उपद्रव लिखकर उनके कारण, लक्षण एवं चिकित्सा का वर्णन कीजिए। 9. विसर्प निम्न श्लोक की पूर्ति कर संबंधित रोग विसर्प की संप्राप्ति, भेद एवं लक्षण लिखिए — “अन्तः प्रकुपिता दोषा विसर्पन्त्यन्तराश्रये च। बहिर्बहिः प्रकुपिता सर्वत्रोभयसंश्रिता॥” 10. उदर रोग उदर रोग का वर्णन कीजिए। 11. बस्ती चिकित्सा बस्ती चिकित्सा का महत्व लिखते हुए बस्ती व्यापद एवं उसकी चिकित्सा का वर्णन कीजिए। 12. उरुस्तम्भ उरुस्तम्भ का सम्पूर्ण वर्णन कीजिए। 13. कल्पस्थान / मदनफल / पंचकर्म लक्षण कल्पस्थान का महत्व लिखते हुए मदनफल का वर्णन कीजिए तथा वमन, विरेचन, निरूह, अनुवासन बस्ती एवं नस्य के सम्यक, हीन एवं अतियोग लक्षण लिखिए। 14. कुष्ठ कुष्ठ व्याधि का सम्पूर्ण वर्णन श्लोक सहित कीजिए। 15. श्वास श्वास व्याधि का सम्पूर्ण वर्णन कीजिए।

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