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पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक एवं शृङ्गवेर के चूर्ण से सिद्ध घृत, तैल अथवा मज्जा का पान कराएँ। (मात्रा — जितनी बल-विरोधी न हो तथा सुपाच्य हो)
घृत एवं तैल से उदर का अभ्यङ्ग करें, तत्पश्चात् बड़े एवं निर्मल वस्त्र से उदर को भली-भाँति दबाकर लपेट दें।
पिप्पल्यादि पाँच औषधियों से साधित घृत-युक्त पतली यवागू का पान कराएँ।
उष्णोदक से परिषेचन कराएँ।
आप्यायन (बृंहण चिकित्सा / माँसबलवर्धक उपाय) करना चाहिए।
परिषेचन के पश्चात् प्रातःकाल स्नेहपान कराएँ। स्नेह के जीर्ण होने पर पुनः परिषेचन करके यवागू पिलाएँ।
यह विधि आनूप देश की स्त्रियों के लिए निषिद्ध है, क्योंकि वहाँ के प्राणियों में कफ की प्रबलता रहती है। यह विधि केवल जाङ्गल देश की स्त्रियों के लिए प्रयोज्य है।
वातहर औषधियों (भद्रदारु आदि) के क्वाथ से पान एवं परिषेक आदि में प्रयोग करें।
पिप्पली, पिप्पलीमूल, हस्तिपिप्पली, चित्रक एवं शृङ्गवेर के चूर्ण को उष्ण गुडोदक के साथ दो से तीन रात्रि तक पिलाएँ — यावत् — दुष्ट शोणित का निष्कासन हो जाए।
विदारिगन्धादि से साधित स्नेह-यवागू अथवा क्षीर-यवागू का पान — प्रसव के तीसरे या चौथे दिन से छठे या सातवें दिन तक कराएँ।
यव, कोल एवं कुलत्थ से सिद्ध जाङ्गल माँसरस के साथ शाली धान्य का ओदन — बल एवं अग्नि का ध्यान रखते हुए खिलाएँ।
क्रोध, व्यायाम एवं मैथुन तथा अन्य पन्द्रह आतुरोपद्रव वर्जित चेष्टाओं का परित्याग करना चाहिए।
परिषेचन उष्णोदक की धारा से करना चाहिए। प्रयोजन —
- गर्भ-क्षोभ से उत्पन्न अशुद्ध रक्त का स्राव कराना
- वायु को विजय करना
स्त्री का स्वेदन (सेक/स्वेद चिकित्सा) करना चाहिए।
| क्रम | चिकित्सा | काल |
|---|---|---|
| स्नेहपान + अभ्यङ्ग | पिप्पल्यादि सिद्ध घृत/तैल | भूख लगने पर |
| परिषेचन | उष्णोदक से | प्रत्येक स्नेह/यवागू से पूर्व |
| यवागू | पिप्पल्यादि सिद्ध | स्नेह जीर्ण होने पर |
| बृंहण चिकित्सा | माँसबलवर्धक | ५-७ रात्रि पश्चात् |
| क्षीर/स्नेह यवागू | विदारिगन्धादि सिद्ध | ३-४ से ६-७ दिन तक |
| शाली ओदन + माँसरस | यव-कोल-कुलत्थ सिद्ध | ७वें-८वें दिन से |
| स्वेदन | — | प्रसवोत्तर |