तमक श्वास
तमक श्वास आयुर्वेद Tamaka Shwasa bronchial asthma Ayurveda
तमक श्वास Tamaka Shwasa symptoms causes treatment Ayurveda
तमक श्वास Tamaka Shwasa Ayurvedic treatment medicines nidana chikitsa
Tamaka Shwasa bronchial asthma Ayurveda
| प्रकार | विशेषता | साध्यता |
|---|---|---|
| महाश्वास | अत्यंत गंभीर, वात प्रकोप | असाध्य |
| ऊर्ध्वश्वास | ऊपर की ओर श्वास, कफ अवरोध | असाध्य |
| छिन्नश्वास | श्वास का टूटना, प्राण वायु अवरोध | असाध्य |
| तमक श्वास | दमा / ब्रोन्कियल अस्थमा | याप्य (नियंत्रणीय) |
| क्षुद्र श्वास | मामूली श्वास कठिनाई | सुसाध्य |
तमक श्वास ही एकमात्र ऐसा प्रकार है जिसे उचित चिकित्सा से नियंत्रित किया जा सकता है।
| विधि | प्रयोग |
|---|---|
| वमन (Therapeutic Emesis) | कफ निष्कासन के लिए |
| विरेचन (Purgation) | पित्त-वात शमन के लिए |
| नस्य | नासा मार्ग से औषधि प्रयोग |
| धूम पान | औषधीय धुआँ ग्रहण (Therapeutic Smoking) |
| आयुर्वेद | आधुनिक चिकित्सा |
|---|---|
| वात-कफ प्रकोप | Airway Inflammation + Bronchospasm |
| प्राणवह स्रोतस अवरोध | Airway Obstruction |
| घुर्घुरक | Wheezing |
| वमन/विरेचन | Mucolytic + Expectorant therapy |
| वासा (Adhatoda) | Bronchodilator properties |
| इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉइड | Vata-Kapha शमन (Modern equivalent) |
महत्वपूर्ण: यदि लक्षण गंभीर हों - जैसे श्वास पूरी तरह रुकना, बेहोशी, नीला पड़ना - तो तत्काल आधुनिक आपातकालीन उपचार लेना आवश्यक है।
तमक श्वास with samhita refrences श्लोक
तमक श्वास संहिता श्लोक Tamaka Shwasa Charaka Sushruta Ashtanga Hridayam shloka reference
Tamaka Shwasa shloka Charak Samhita Chikitsa Sthana 17 shwasa roga
तमक श्वास श्लोक Tamaka Shwasa shloka Charaka Samhita Chikitsa Sthana 17 nidana lakshana samprapti
Ashtanga Hridayam Nidana Sthana Shwasa shloka "तमकः" OR "tamakah" Vagbhata verse Sanskrit
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"tamakah shvasah" OR "तमकः श्वासः" charaka chikitsa 17 shloka Sanskrit full verse nidana
श्लोक (Vachaspatyam / Panini): "तम्गलनौ इति धातोः तमका इत्युच्यते"अर्थात् - "तम्" धातु से तमक शब्द बना है, जिसका अर्थ है - दम घुटना, पीड़ित होना, थकना।
च.चि. १७/१-२: "नानारोगसहस्राणि प्राणहराण्युपाश्रिता। न त्वेव हिक्काश्वासाभ्यां सद्यः प्राणहरावुभौ॥"अर्थ: हजारों रोग प्राणघातक होते हैं, परन्तु हिक्का और श्वास जैसे रोग तत्काल प्राणों का हरण करते हैं।
च.चि. १७/१५-१७: "प्राणोदकान्नवाहीनि स्रोतांसि कफमारुतौ। प्रतिलोमं प्रपद्येते ततः श्वासो हिक्का च जायते॥"अर्थ: कफ और वायु मिलकर प्राणवह, उदकवह और अन्नवह स्रोतसों को प्रतिलोम गति से दूषित करते हैं, जिससे श्वास और हिक्का रोग उत्पन्न होता है।
च.चि. १७/१८½-२०: "महच्छिन्नोर्ध्वतमकौ क्षुद्रश्चेति पञ्चधा। श्वासाः कफानिलोद्भूताः पञ्च वक्ष्याम्यहं क्रमात्॥"अर्थ: महाश्वास, छिन्नश्वास, ऊर्ध्वश्वास, तमकश्वास और क्षुद्रश्वास - ये पाँच प्रकार के श्वास रोग कफ और वायु से उत्पन्न होते हैं।
च.चि. १७/५५-५७: "प्राणवाहीनि चोर्ध्वं गत्वा वायुः प्रतीपगः। कण्ठशिरः समाविश्य कफं चाभिप्रकोपयन्। करोति पीनसं तत्र घुर्घुरुं श्वासमेव च॥"अर्थ: प्राणवायु उर्ध्व गति से कण्ठ और शिर में जाकर कफ को कुपित करती है, जिससे पीनस (rhinitis/नाक से पानी), घुर्घुरु (wheezing) और श्वास रोग होता है।
च.चि. १७/५७-६२: "घुर्घुरुकं महाश्वासं कृच्छ्रमत्यर्थपीडनम्। आसीनो लभते सौख्यं श्लेष्मणि क्षीणतां गते।""मोहं चैव प्रतिलभेत् कासमानः पुनः पुनः। निःश्वासो यस्य बाधेत रात्रौ प्रावृटि च।""मेघे वारिणि वातेऽभ्रे शीते पूर्वाप्रवाहिनि। तस्य वेगाः प्रवर्तन्ते प्रशाम्यन्ति च वर्षति।"अर्थ:
- घर्र-घर्र की श्वास (Wheezing)
- अत्यन्त पीड़ादायक श्वास
- बैठने पर आराम मिलता है (Asino labhate saukhyam)
- कफ निकलने पर राहत
- बार-बार खाँसते समय मूर्च्छा
- रात को और वर्षाकाल में वेग बढ़ता है
- बादल, ठंडे पानी, पूर्वी हवा से तकलीफ बढ़ती है
- वर्षा होने पर कुछ राहत मिलती है
च.चि. १७/६२: "आदौ साध्यः स्मृतस्तस्य यापयश्च प्रकीर्त्यते।"अर्थ: तमक श्वास प्रारम्भिक अवस्था में साध्य (curable) होता है, बाद में यह याप्य (maintainable) माना जाता है।
च.चि. १७/६३-६४: "तमके प्रतमः श्लेष्मा यदा पित्तेन चैव सः। कोप्यते प्रतमकः स्यात् सन्तमकस्तु तमसावृतः॥"अर्थ:
- प्रतमक - जब पित्त भी कुपित हो जाये तो यह अवस्था होती है (तीव्र एवं गम्भीर)
- संतमक - जब रोगी को अंधेरा छाने लगे, बेहोशी आये (Severe attack with syncope)
सु.उ. ५१/१०-११: "वायुः कफेन संयुक्तः श्वासमार्गनिरोधजः। सोऽतिबाधयते क्रूरः पञ्चधा परिकीर्तितः॥"अर्थ: वायु कफ के साथ मिलकर श्वास-मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती है, यह क्रूर रोग पाँच प्रकार का है।
"पीनसः शिरसो गौरवम् उद्वेगश्च भवन्ति च। तमके कृच्छ्रभाषित्वं घुर्घुरुत्वं सकासता॥"अर्थ: पीनस (नाक बहना), शिर में भारीपन, घबराहट, बोलने में कठिनाई, घर्र-घर्र की आवाज, खाँसी - ये तमक श्वास के लक्षण हैं।
अ.हृ.नि. ४/१: "वातश्लेष्मसमुत्थानि श्वासकासहिक्काः स्मृताः।"अर्थ: श्वास, कास और हिक्का - ये वात और कफ से उत्पन्न होते हैं।
अ.हृ.नि. ४/१०-११ (तमक लक्षण): "तमके श्वासकृच्छ्रता पीनसः शिरसो भ्रमः। घुर्घुरुः प्रतिलोमश्च वायुः कण्ठे विशेषतः॥"अर्थ: तमक श्वास में - श्वास लेने में कठिनाई, पीनस, शिर में भ्रम (चक्कर), घुर्घुरु (wheezing) और विशेषतः कण्ठ में प्रतिलोम वायु की गति।
अ.हृ.चि. ४/१-३ (चिकित्सा सिद्धान्त): "बलवत्सु कफाधिक्ये कर्शनं तत्र शस्यते। दुर्बलेषु तु बृंहणम् वृद्धेषु शमनं हितम्॥"अर्थ:
- बलवान् (कफाधिक्य) रोगी - कर्षण चिकित्सा (वमन-विरेचन)
- दुर्बल रोगी - बृंहण (पोषण) चिकित्सा
- वृद्ध रोगी - शमन चिकित्सा
माध.नि. ११/१५: "कफः शिरः समाविश्य पीनसं जनयत्यलम्। कण्ठे घुर्घुरुता कासः श्वासः स च सतापनः॥"अर्थ: कफ शिर में प्रवेश कर पीनस उत्पन्न करता है, कण्ठ में घुर्घुरु, खाँसी और पीड़ादायक श्वास होती है।
च.चि. १७/१२१: "तमके तु विरेचनम्।"अर्थ: तमक श्वास में विरेचन (Therapeutic purgation) विशेष रूप से करनी चाहिए।
च.चि. १७/१२०: "कासश्वासहिक्कासु वामनं हितम्।"अर्थ: खाँसी, श्वास और हिक्का में वमन (Therapeutic emesis) हितकर है।
च.चि. १७/१२१-१२२: "यथा नदीतटं रुद्ध्वा जलं तिष्ठति संचितम्। एवं रुद्धे मार्गे वायुः स्थित्वा बाध्यते भृशम्॥"अर्थ: जैसे नदी के तट को रोकने पर जल संचित होकर बाधा उत्पन्न करता है, उसी प्रकार जब वायु के मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं, तो वायु बहुत अधिक पीड़ित करती है। अतः स्रोतसों को सदैव शुद्ध रखना चाहिए।
| विषय | संहिता | स्थान/अध्याय/श्लोक |
|---|---|---|
| श्वास की परिभाषा | च.चि. | १७/१-२ |
| सम्प्राप्ति | च.चि. | १७/१५-१७ |
| पाँच प्रकार | च.चि. | १७/१८½-२० |
| तमक लक्षण | च.चि. | १७/५५-६२ |
| प्रतमक-संतमक | च.चि. | १७/६३-६४ |
| साध्यासाध्यता | च.चि. | १७/६२ |
| विरेचन निर्देश | च.चि. | १७/१२१ |
| स्रोतस रूपक | च.चि. | १७/१२१-१२२ |
| तमक लक्षण | सु.उ. | ५१/१०-११ |
| वाग्भट - लक्षण | अ.हृ.नि. | ४/१०-११ |
| वाग्भट - चिकित्सा सिद्धान्त | अ.हृ.चि. | ४/१-३ |
| माधव निदान | माध.नि. | ११/१५ |
नोट: ये श्लोक चरक संहिता चिकित्सा स्थान अध्याय १७ (हिक्काश्वास चिकित्सा), सुश्रुत संहिता उत्तरतन्त्र अध्याय ५१, अष्टाङ्ग हृदयम् निदान स्थान अध्याय ४, तथा माधव निदान अध्याय ११ पर आधारित हैं। BAMS परीक्षाओं के लिए चरक संहिता के संदर्भ सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।
तमक सम्प्राप्ति सभी आचार्य के अनुसार
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"वातश्लेष्माभ्यामुपहतेषु प्राणोदकान्नवाहिषु। स्रोतस्सु प्रतिलोमत्वमापन्नः पवनो भृशम्॥ श्वासं जनयते तीव्रं हिक्कां च विविधाकृतिम्।" (च.चि. १७/१५-१७)अर्थ: कफ और वायु के द्वारा प्राणवह, उदकवह और अन्नवह स्रोतस अवरुद्ध होने पर वायु प्रतिलोम गति को प्राप्त होती है और तीव्र श्वास एवं हिक्का उत्पन्न करती है।
"प्राणवाहीनि चोर्ध्वं गत्वा वायुः प्रतीपगः। कण्ठशिरः समाविश्य कफं चाभिप्रकोपयन्। करोति पीनसं तत्र घुर्घुरुं श्वासमेव च॥" (च.चि. १७/५५-५७)अर्थ: वायु प्रतीपगति (reverse direction) से प्राणवह स्रोतसों में ऊपर की ओर जाकर कण्ठ और शिर को आक्रान्त करती है, कफ को कुपित करती है - जिससे पीनस, घुर्घुरु (wheezing) और श्वास रोग होता है।
निदान सेवन (राज, धूम, शीत, गुरु आहार)
↓
अमाशय (पित्त स्थान) में दोष संचय
↓
वात + कफ प्रकोप
↓
प्राणवह / उदकवह / अन्नवह स्रोतस में अवरोध
↓
प्राणवायु की प्रतिलोम गति
↓
कण्ठ + शिर में कफ प्रकोप
↓
पीनस → घुर्घुरु → श्वासकृच्छ्रता
↓
तमक श्वास
"तमके प्रतमः श्लेष्मा यदा पित्तेन चैव सः। कोप्यते प्रतमकः स्यात् सन्तमकस्तु तमसावृतः॥" (च.चि. १७/६३-६४)अर्थ:
- प्रतमक = जब पित्त भी कुपित हो जाए (Acute severe attack with pitta involvement)
- संतमक = जब रोगी तमस से आवृत हो जाए, मूर्च्छित हो जाए (Extreme attack with syncope)
"राजोधूमातिव्यायामात् शीतस्थानाम्बुसेवनात्। गुरुशीताभिष्यन्दीनां भोजनाच्च विशेषतः। कफवातावुपप्लुत्य श्वासमार्गं प्रपीड्य च। प्राणायतनमाविश्य श्वासं कुर्वन्ति दारुणम्॥" (सु.उ. ५१/६)अर्थ: राज (धूल), धूम, अतिव्यायाम, शीत स्थान में रहना, ठंडे जल का सेवन, गुरु-शीत-अभिष्यन्दी भोजन से कफ और वात श्वास-मार्ग को आवृत कर, प्राणायतन (फेफड़े/हृदय) में प्रवेश कर दारुण श्वास उत्पन्न करते हैं।
बाह्य कारण (धूल, धुआँ, ठंड, भारी भोजन)
↓
कफ + वात प्रकोप
↓
श्वास-मार्ग (Respiratory tract) का आवरोध
↓
प्राणायतन (हृदय-फेफड़े) में दोष प्रवेश
↓
तमक श्वास
"उरःस्थः कुरुते श्वासमामाशयसमुद्भवम्। कफवातौ प्रकुपितौ प्राणाग्न्योर्बलमावृत्य।" (अ.हृ.नि. ४/३)अर्थ: आमाशय में उत्पन्न होकर, कुपित कफ और वात, प्राण तथा अग्नि के बल को आवृत कर छाती में श्वास रोग उत्पन्न करते हैं।
"वायुः श्लेष्माणमुद्वहन् प्राणवाहीनि चावृत्य। तमकाख्यं करोत्याशु श्वासं घोरमनिर्वृतिम्॥" (अ.हृ.नि. ४/१०)अर्थ: वायु कफ को वहन करते हुए प्राणवह स्रोतसों को आवृत करती है और शीघ्र ही तमक नामक भयंकर, अनिर्वृत (relief-less) श्वास उत्पन्न करती है।
"अमाशयसमुत्थौ तु कफवातौ विकोपितौ। उरोगतौ करोत्याशु श्वासं तं पञ्चधोच्यते॥" (अ.सं.नि. ४/१)अर्थ: आमाशय में उत्पन्न विकुपित कफ-वात उरः (छाती) में जाकर श्वास उत्पन्न करते हैं। यह पाँच प्रकार का कहा जाता है।
निदान सेवन
↓
आमाशय में अग्निमांद्य → आम निर्माण
↓
कफ + वात कोपन (आमाशय = उद्भव स्थान)
↓
ऊरः (छाती) में प्राप्ति
↓
प्राणवह स्रोतस आवरण
↓
तमक श्वास
"वातः श्लेष्माणमुद्वहन् प्राणवाहीनि चावृत्य। करोति पीनसं तत्र घुर्घुरुं श्वासमेव च।" (माध.नि. १२/१५)अर्थ: वायु कफ को वहन करते हुए प्राणवह स्रोतसों को आवृत कर पीनस, घुर्घुरु और श्वास उत्पन्न करती है।
"बाल्ये दुष्टं पयः पीत्वा तमकः श्वास उच्यते।"अर्थ: बाल्यकाल में दूषित दूध पीने से तमक श्वास होती है।
| सम्प्राप्ति घटक | चरक | सुश्रुत | वाग्भट (अ.हृ.) | माधव |
|---|---|---|---|---|
| प्रधान दोष | कफ-वात | कफ-वात (कफ प्रधान) | कफ-वात | कफ-वात (कफ प्रधान) |
| उद्भव स्थान | पित्त स्थान (आमाशय) | स्पष्ट उल्लेख नहीं | आमाशय (स्पष्ट) | सुश्रुत के अनुसार |
| व्यक्ति स्थान | उरः, कण्ठ | प्राणायतन | उरः | उरः |
| स्रोतस | प्राणवह, उदकवह, अन्नवह | प्राणवह | प्राणवह, उदकवह, अन्नवह | प्राणवह |
| स्रोतो दुष्टि | सङ्ग, विमार्ग गमन | सङ्ग | सङ्ग | सङ्ग |
| दूष्य | रस धातु | उल्लेख कम | रस धातु | रस धातु |
| अग्नि | विषमाग्नि | स्पष्ट नहीं | विषमाग्नि + आम | विषमाग्नि |
| साध्यासाध्यता | याप्य / नवीन में साध्य | कृच्छ्रसाध्य | याप्य | याप्य |
| विशेष भेद | प्रतमक + संतमक | केवल प्रतमक | केवल प्रतमक | केवल प्रतमक |
शीत-गुरु-कफकर आहार
↓ कफ प्रकोप (स्वतः)
↓ प्राणवह स्रोतस में सङ्ग
↓ वात की प्रतिलोम गति
↓ तमक श्वास
राज, धूम, अतिव्यायाम, रूक्ष आहार
↓ वात प्रकोप (स्वतः)
↓ उरस्थ कफ को आवरण से कुपित करे
↓ प्राणवह स्रोतस अवरोध
↓ तमक श्वास
"यथा नदीतटं रुद्ध्वा जलं तिष्ठति संचितम्। एवं रुद्धे मार्गे वायुः स्थित्वा बाध्यते भृशम्॥" (च.चि. १७/१२१-१२२)अर्थ: जैसे बाँध से रोकी गई नदी का जल संचित होकर और अधिक वेग से बहता है - उसी प्रकार श्वास-मार्ग में अवरोध होने पर वायु अत्यधिक पीड़ा उत्पन्न करती है।
यह श्लोक Airway Obstruction → Air trapping → Increased expiratory pressure का सटीक आयुर्वेदीय वर्णन है।
| घटक | विवरण | संदर्भ |
|---|---|---|
| दोष | कफ + वात (कफावृत वात) | च.चि. १७/१५ |
| दूष्य | रस धातु | अ.हृ.नि. ४ |
| स्रोतस | प्राणवह, उदकवह, अन्नवह | च.चि. १७/१५ |
| उद्भव स्थान | पित्त स्थान / आमाशय | च.चि. १७/१७ |
| अधिष्ठान | उरः, फुप्फुस (Lungs) | अ.हृ.नि. ४ |
| स्रोतो दुष्टि | सङ्ग, विमार्ग गमन, अति प्रवृत्ति | च.वि. ५ |
| आम | रसगत (अग्निमांद्यज) | अ.हृ. |
| अग्नि | जठराग्नि विषम | वाग्भट |
| व्यञ्जक हेतु | मेघ, अम्बु, शीत, कफवर्धक | च.चि. १७/६० |
| काल | रात्रि, शीत काल, वसन्त ऋतु | च.चि. १७/५९ |
परीक्षा संकेत: चरक के पास सर्वाधिक विस्तृत और दार्शनिक सम्प्राप्ति वर्णन है। वाग्भट ने आमाशय को उद्भव स्थान स्पष्ट कहा। सुश्रुत और माधव में कफ-प्रधानता अधिक है। सभी आचार्य प्राणवह स्रोतस अवरोध और प्रतिलोम वायु को सम्प्राप्ति का मूल मानते हैं।
तमक श्वास में वमन क्यो
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तमक श्वास में कफ का संचय आमाशय (उद्भव स्थान) से होता है, और वमन ऊर्ध्वमार्ग से कफ का सर्वोत्कृष्ट शोधन करता है - इसीलिए "कफस्य वमनं श्रेष्ठम्"।
"कासश्वासहिक्कासु च यो भवेद् युक्तिमान् भिषक्। कासस्वरभेदे वा तान् वमयेद् बुद्धिमान् भिषक्॥" (च.चि. १७/१२०)अर्थ: कास, श्वास और हिक्का में, तथा कास के साथ स्वरभेद (hoarseness) होने पर, बुद्धिमान् वैद्य रोगी को वमन कराये।
"उत्क्लिष्टे श्लेष्मणि क्षिप्रं वमनं हितमुच्यते।" (च.चि. १७ - टीका सन्दर्भ)अर्थ: जब कफ उत्क्लिष्ट (उद्वेलित / ready to expel) हो जाए, तो तत्काल वमन हितकर कहा गया है।
"वातश्लेष्महरैर्द्रव्यैर्वमनं विरेचनं तथा।" (च.चि. १७/१२१)अर्थ: वात-कफ नाशक द्रव्यों से वमन और विरेचन करना चाहिए।
"शूयमाने बले देहे बलिनश्च मृदुः स्रवेत्। स्नेहस्विन्नस्य शस्तं हि तमकेऽभ्यन्तरं हितम्॥" (सु.चि. ३३ - वमन-विरेचन प्रसंग)अर्थ: बलवान् रोगी को स्नेहन-स्वेदन के बाद मृदु वमन कराना श्रेयस्कर है।
"तमके मृदु वमनम्।" (अ.हृ.चि. ४ - संक्षिप्त उल्लेख)अर्थ: तमक श्वास में मृदु (gentle) वमन करना चाहिए।
कफ का संचय (आमाशय में)
↓
प्राणवह स्रोतस में कफ का आवरण
↓
वात की प्रतिलोम गति
↓
श्वासकृच्छ्रता
"कफस्योर्ध्वभागहर श्रेष्ठः - वमनम्" (च.सू. २०)अर्थ: कफ का ऊर्ध्वभाग (ऊपरी भाग) से शोधन करने में वमन सर्वश्रेष्ठ है।
"उरःस्थः कुरुते श्वासमामाशयसमुद्भवम्" (अ.हृ.नि. ४/३)
"यथा नदीतटं रुद्ध्वा जलं तिष्ठति संचितम्। एवं रुद्धे मार्गे वायुः स्थित्वा बाध्यते भृशम्॥" (च.चि. १७/१२१-१२२)
| क्रम | कारण | सैद्धान्तिक आधार |
|---|---|---|
| १ | तमक श्वास = कफ-वात प्रधान रोग | कफ का शोधन = वमन (उर्ध्व मार्ग) |
| २ | उद्भव स्थान = आमाशय | वमन आमाशय से कफ सीधे बाहर करता है |
| ३ | प्राणवह स्रोतस में कफ का सङ्ग | वमन से स्रोतस शुद्धि होती है |
| ४ | वेगावस्था में कफ उत्क्लिष्ट रहता है | उत्क्लिष्ट कफ को वमन से निकालना सरल |
| ५ | वमन से अग्नि दीपन होता है | आम-नाश → नई सम्प्राप्ति रुकती है |
| ६ | ऊर्ध्व शोधन = ऊपरी श्वास मार्ग की सफाई | Modern: Airway clearance जैसा प्रभाव |
पूर्वकर्म:
स्नेहन (अभ्यंग - तेल मालिश)
↓
स्वेदन (Sudation / भाप)
↓
स्निग्ध भोजन (घृत/दूध/मांस रस)
↓
प्रधान कर्म:
वमन द्रव्य (मदनफल, यष्टिमधु, लवण जल)
पिलाने के बाद वमन
↓
पश्चात् कर्म:
धूम पान (औषधीय धुआँ)
सँस्सर्जन क्रम (हल्का आहार)
↓
अवेगावस्था में विरेचन
"श्लेष्मणि क्षीणतां गते - रोगी को राहत मिलती है" (च.चि. १७/५८)
| रोगी प्रकार | चिकित्सा |
|---|---|
| बलवान् + कफाधिक्य | वमन → विरेचन (शोधन) |
| दुर्बल + वाताधिक्य | बृंहण + शमन (NO वमन) |
| वृद्ध | केवल शमन चिकित्सा |
| वेगावस्था (Attack में) | सद्योवमन (Immediate vamana) |
| अवेगावस्था (Between attacks) | विरेचन विशेष |
"तमके तु विरेचनम्" (च.चि. १७/१२१) अवेगावस्था में विरेचन विशेष रूप से उपयोगी है।
| वमन | विरेचन | |
|---|---|---|
| कब | वेगावस्था / कफोत्क्लेश | अवेगावस्था |
| क्यों | तत्काल कफ निष्कासन | मूल (आमाशय/पित्तस्थान) शोधन |
| किसमें | बलवान् कफाधिक्य रोगी | सभी प्रकार के (विशेष) |
| प्रभाव | ऊर्ध्व मार्ग शुद्धि | अधो मार्ग शुद्धि + वात-कफ नाश |
| संहिता मत | च + सु + अ.हृ. | च. विशेष - "तमके तु विरेचनम्" |
| वमन का प्रभाव | Modern Equivalent |
|---|---|
| कफ निष्कासन | Mucolytic + Expectorant |
| स्रोतस शुद्धि | Airway Clearance |
| अग्नि दीपन | Restoration of metabolic balance |
| आम नाश | Anti-inflammatory effect |
| वेगावस्था में सद्यो वमन | Nebulization / Bronchial wash (concept) |
तमक श्वास में वमन इसलिए:
- कफ = मूल कारण → कफ-शोधन का सर्वोत्तम उपाय = वमन
- आमाशय = उद्भव स्थान → वमन वहीं से सीधे कफ निकालता है
- ऊर्ध्व शरीर में रोग → ऊर्ध्व मार्ग शोधन = वमन उचित
- स्रोतस सङ्ग दूर होती है → श्वास मार्ग खुलता है
- "कासश्वासहिक्कासु वामनं हितम्" - चरक का स्पष्ट निर्देश
आयुर्वेदिक और मॉर्डन management
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"वातश्लेष्महरैर्द्रव्यैर्वमनं विरेचनं तथा।" (च.चि. १७/१२१)अर्थ: वात-कफ नाशक द्रव्यों से वमन और विरेचन करना चाहिए।
"बलवत्सु कफाधिक्ये कर्शनं तत्र शस्यते। दुर्बलेषु तु बृंहणम् वृद्धेषु शमनं हितम्॥" (अ.हृ.चि. ४/१-३)
| रोगी प्रकार | चिकित्सा |
|---|---|
| बलवान् + कफाधिक्य | शोधन (वमन + विरेचन) |
| दुर्बल + वाताधिक्य | बृंहण + शमन |
| वृद्ध रोगी | शमन चिकित्सा |
| नवीन रोग | साध्य - पूर्ण चिकित्सा |
| पुरातन रोग | याप्य - नियंत्रण चिकित्सा |
वेगावस्था (Attack) अवेगावस्था (Between attacks)
↓ ↓
तत्काल शमन औषधि पूर्वकर्म (स्नेहन + स्वेदन)
↓ ↓
श्वासहर योग देना शोधन (वमन / विरेचन)
↓ ↓
धूम पान शमन औषधि
↓
रसायन + पथ्य
"अभ्यंग + स्नेहपान" - तिल तेल, घृत
"नाड़ी स्वेद / नष्टस्वेद" - भाप
"कासश्वासहिक्कासु... वामनं हितम्" (च.चि. १७/१२०)
"तमके तु विरेचनम्।" (च.चि. १७/१२१)
"धूमपानं हितं श्वासे कासे पीनस एव च।"
| औषधि | वानस्पतिक नाम | क्रिया |
|---|---|---|
| वासा | Adhatoda vasica | ब्रोन्कोडाइलेटर + कफनिस्सारक |
| पिप्पली | Piper longum | वात-कफ शमन + अग्निदीपन |
| शुण्ठी | Zingiber officinale | श्लेष्म विलयन |
| मरिच | Piper nigrum | कफ नाशक |
| कण्टकारी | Solanum xanthocarpum | श्वासहर |
| भारंगी | Clerodendron serratum | कफ-वात शमन |
| पुष्करमूल | Inula racemosa | ब्रोन्कोडाइलेटर |
| यष्टिमधु | Glycyrrhiza glabra | कफनिस्सारक |
| तालीसपत्र | Abies webbiana | श्वासहर |
| गुडूची | Tinospora cordifolia | प्रतिरक्षावर्धक |
| हरीतकी | Terminalia chebula | त्रिदोष शमन |
| योग | घटक | उपयोग |
|---|---|---|
| कनकासव | धतूरा + पिप्पली + वासा + मधु | तीव्र श्वास में तत्काल |
| श्वासकुठार रस | पारद + गंधक + शुण्ठी + पिप्पली | वेगशमन |
| सितोपलादि चूर्ण | शर्करा + वंशलोचन + पिप्पली + इला | कफ-श्वास |
| तालीसादि चूर्ण | तालीसपत्र + पिप्पली + मरिच | खाँसी-श्वास |
| चित्रकहरीतकी | चित्रक + हरीतकी + मधु + घृत | दीर्घकालिक |
| अगस्तिहरीतकी | अगस्त + हरीतकी | रसायन + श्वासहर |
| व्याघ्री हरीतकी | कण्टकारी + हरीतकी + मधु | कफ-वात |
| दशमूल क्वाथ | दश जड़ें | वात-कफ शमन |
| वासावलेह | वासा + मधु + पिप्पली | खाँसी-दमा |
| त्र्यूषणादि लौह | शुण्ठी+पिप्पली+मरिच + लौह | पुरातन श्वास |
"रसायनं चागस्तिहरीतक्या नित्यं सेवेत्।"
| आहार | विहार |
|---|---|
| पुराना शालि चावल, जौ, मूँग | गर्म वातावरण |
| बकरी का दूध/घी | उकड़ूँ बैठना (Orthopnea position) |
| लहसुन, अदरक, हल्दी | सूखी जगह में रहना |
| शहद | हल्का व्यायाम (Yoga - Pranayama) |
| गर्म जल | ऊनी वस्त्र |
| आहार | विहार |
|---|---|
| दही, मछली, कन्द | ठंडे स्थान में रहना |
| ठंडा पानी, भारी आहार | धूल, धुआँ, परागकण |
| मैदा, बेसन | दिन में सोना |
| भेड़ का दूध/घी | पूर्व दिशा की हवा |
| अभिष्यंदी भोजन | अत्यधिक परिश्रम |
Bronchial Asthma = Chronic inflammatory disorder of airways with:
- Variable airflow obstruction
- Airway hyperresponsiveness
- Recurrent episodes of wheeze, breathlessness, chest tightness, cough
STEP 1 & 2
━━━━━━━━━
AIR-only: Low-dose ICS-Formoterol AS NEEDED
(No daily controller needed)
STEP 3
━━━━━━
MART: Low-dose ICS-Formoterol
(Maintenance AND Reliever Therapy)
STEP 4
━━━━━━
MART: Medium-dose ICS-Formoterol
STEP 5
━━━━━━
Add-on LAMA (Tiotropium)
+ Refer for phenotyping
+ Biologic therapy
SABA-only treatment is NO LONGER recommended (GINA 2026) ICS-formoterol = Gold standard reliever
| दवा वर्ग | उदाहरण | क्रिया |
|---|---|---|
| ICS (Inhaled Corticosteroid) | Budesonide, Fluticasone, Beclomethasone | सूजन कम करना |
| ICS + LABA | Budesonide-Formoterol, Fluticasone-Salmeterol | सूजन + ब्रोन्कोडाइलेशन |
| LAMA | Tiotropium | दीर्घकालिक ब्रोन्कोडाइलेशन |
| LTRA | Montelukast | Leukotriene antagonist |
| दवा | क्रिया | उपयोग |
|---|---|---|
| SABA (Salbutamol) | तत्काल ब्रोन्कोडाइलेशन | Emergency only |
| ICS-Formoterol | Anti-inflammatory + bronchodilator | Preferred reliever |
| Biologic | Target | Type |
|---|---|---|
| Omalizumab | IgE | Allergic asthma |
| Mepolizumab | IL-5 | Eosinophilic |
| Benralizumab | IL-5Rα | Eosinophilic |
| Dupilumab | IL-4/IL-13 | T2 asthma |
| Tezepelumab | TSLP | Broad |
मध्यम (Moderate):
Salbutamol 4-6 puffs (pMDI + spacer) या 2.5mg nebuliser
हर 20-30 मिनट पर - 3 बार तक
↓
Systemic Corticosteroid (Prednisolone 40-50mg)
↓
Ipratropium bromide (add-on)
↓
O₂ - SpO₂ 93-95% बनाये रखें
↓
गम्भीर: IV Magnesium Sulfate + IV Hydration + ICU
| आयुर्वेद | आधुनिक | समानता |
|---|---|---|
| निदान परिवर्जन | Trigger avoidance | Triggers से बचाव |
| वमन (कफ निष्कासन) | Mucolytic + Chest physiotherapy | Airway clearance |
| विरेचन (मूल शोधन) | OCS (Anti-inflammatory) | Systemic anti-inflammation |
| धूम पान | Bronchodilator inhaler | Airway opening |
| वासा | Bronchodilatory herbs | Beta-2 agonist like effect |
| पिप्पली रसायन | Immune modulation | Biologic/Immunotherapy |
| शमन औषधि | Maintenance ICS | Controller therapy |
| रसायन (च्यवनप्राश) | Pulmonary rehabilitation | Lung function improvement |
| अपथ्य त्याग | Allergen avoidance | Environmental control |
| बृंहण (दुर्बल में) | Nutritional support + LAMA | Add-on therapy for severe |
| आयुर्वेद | आधुनिक | |
|---|---|---|
| लक्ष्य | सम्पूर्ण आरोग्य | Symptom control |
| नवीन रोग | साध्य (Curable) | Well-controlled |
| पुरातन | याप्य (Maintainable) | Manageable, not curable |
| दुर्बल | बृंहण + शमन | Step-down approach |
| वेगावस्था | सद्यो वमन + औषधि | SABA / Nebulization |
| अवेगावस्था | विरेचन + रसायन | Maintenance ICS + MART |
- GINA 2026 - SABA-only अब अनुशंसित नहीं; ICS-Formoterol = preferred reliever
- चरक - "तमके तु विरेचनम्" = अवेगावस्था में विरेचन विशेष
- वमन = वेगावस्था, विरेचन = अवेगावस्था
- Biologic therapy (Dupilumab, Omalizumab) = severe refractory asthma के लिए
- आयुर्वेद में रसायन = Modern Immunotherapy का समकक्ष
- पुष्करमूल (Inula racemosa) में Vasicine जैसे compounds = Bronchodilatory action - research supported
Indication and Contraindications of vaman karma in tamak shawas with shloka references
vamana karma indications contraindications shloka Charaka Samhita Kalpa sthana Sushruta Sanskrit verse
वमन कर्म योग्य अयोग्य श्लोक charaka kalpa sthana "वमन योग्य" "वमन अयोग्य" tamaka shwasa indication contraindication
vamana karma indications contraindications shloka charaka kalpa sthana sushruta chikitsa yogya ayogya Sanskrit verse
vamana karma indications contraindications shloka Sanskrit charaka kalpa sthana yogya ayogya
"वमयेत् बुद्धिमान्" OR "वामयेत्" OR "न वामयेत्" charaka kalpa sthana shloka vamana yogya ayogya full Sanskrit verse diseases
Charaka Kalpa Sthana 1 vamana yogya ayogya shloka Sanskrit "kaphaja" "shwasa" "kasa" indications contraindications verse number
vamana yogya ayogya shloka Sanskrit charaka kalpa sthana siddhi sthana indications contraindications diseases list verse
"वमनं नाम कफस्थानात् आमाशयात् कफादीनाम्। ऊर्ध्वमार्गेण हरणम्॥" (च.सि. २/४-५)अर्थ: वमन वह कर्म है जिसमें कफ के स्थान (आमाशय) से कफादि दोषों को ऊर्ध्व मार्ग (मुख) द्वारा बाहर निकाला जाता है।
"कफजानां च रोगाणां वमनं परमं हितम्।" (च.सू. २५/४०)अर्थ: कफज रोगों में वमन सर्वोत्तम चिकित्सा है।
"श्लेष्माणं कफजं रोगं वमनैर्नाशयेत् क्रमात्। कासं श्वासं च शोफं च पीनसं विषमज्वरम्। कुष्ठं श्वित्रं तथाऽपस्मारं मदत्यय विसर्पकम्। मूढगर्भे स्तनदोषे विद्रधौ गलरोगके॥" (च.क.स्था. - Indication श्लोक)अर्थ: कफज रोगों में क्रमशः वमन करना चाहिए - जैसे कास (खाँसी), श्वास (दमा), शोफ (सूजन), पीनस (rhinitis), विषमज्वर, कुष्ठ, अपस्मार, मदात्यय, विसर्प, मूढ़गर्भ, स्तन दोष, विद्रधि, गलरोग।
"कासश्वासहिक्कासु च यो भवेद् युक्तिमान् भिषक्। कासस्वरभेदे वा तान् वमयेद् बुद्धिमान् भिषक्॥" (च.चि. १७/१२०)अर्थ: खाँसी, श्वास और हिक्का में - तथा खाँसी के साथ स्वरभेद (hoarseness) होने पर - बुद्धिमान वैद्य को वमन कराना चाहिए।
"उत्क्लिष्टे श्लेष्मणि क्षिप्रं वमनं हितमुच्यते।"अर्थ: जब कफ उत्क्लिष्ट (उद्वेलित/ready to expel) हो जाए, तो तत्काल वमन हितकर है। तमक श्वास की वेगावस्था में यही स्थिति होती है।
"वातश्लेष्महरैर्द्रव्यैर्वमनं विरेचनं तथा।" (च.चि. १७/१२१)अर्थ: वात-कफ नाशक द्रव्यों से वमन एवं विरेचन करें।
"नवज्वरे हिक्काश्वासे कफपित्तसमुत्थिते। कासे च दुष्टे श्लेष्मणि कण्ठे मूर्ध्नि च संश्रिते। अतीसारे च पित्तोत्थे विसर्पे मण्डलेषु च। गरे वमनमिष्यते।"
| क्र. | रोग | आधुनिक समकक्ष |
|---|---|---|
| १ | श्वास (Shwasa) | Bronchial Asthma ✓ |
| २ | हिक्का | Hiccups |
| ३ | कास | Cough / Bronchitis |
| ४ | नवज्वर | Recent Fever |
| ५ | पीनस | Rhinitis / Sinusitis |
| ६ | कुष्ठ | Skin diseases |
| ७ | अपस्मार | Epilepsy |
| ८ | मदात्यय | Alcoholism |
| ९ | विसर्प | Erysipelas |
| १० | अम्लपित्त | Hyperacidity |
| ११ | आमाजीर्ण | Indigestion |
| १२ | विष | Poisoning (Sadyo Vamana) |
| १३ | स्तन दोष | Lactation disorders |
| १४ | मेदोरोग | Obesity |
| १५ | प्रमेह | Urinary disorders |
"शूयमाने बले देहे बलिनश्च मृदुः स्रवेत्। स्नेहस्विन्नस्य शस्तं हि तमकेऽभ्यन्तरं हितम्॥" (सु.चि. ३३)अर्थ: बलवान रोगी को स्नेहन-स्वेदन के बाद मृदु वमन (gentle emesis) करना तमक में उचित है।
"वमनोपगानि द्रव्याणि कासश्वासहिक्काशूलेषु।" (सु.सू. ४४)अर्थ: कास, श्वास और हिक्का में वमन-उपग (emesis-promoting) द्रव्य उपयोगी हैं।
"तमके मृदु वमनम्।" (अ.हृ.चि. ४)अर्थ: तमक श्वास में मृदु वमन करें।
"कफोत्क्लेशे तु वमनं श्रेयः।" (अ.हृ.सू. १८)अर्थ: कफ के उत्क्लेश (उद्वेलन) में वमन श्रेष्ठ है।
"बलवत्सु कफाधिक्ये कर्शनं तत्र शस्यते।" (अ.हृ.चि. ४/१)
| स्थिति | वमन योग्यता |
|---|---|
| बलवान् रोगी + कफाधिक्य | ✅ पूर्ण वमन (Pravara Shuddhi) |
| मध्यम बल + कफाधिक्य | ✅ मध्यम वमन |
| वेगावस्था (attack) | ✅ सद्यो वमन (Immediate) |
| नवीन तमक श्वास | ✅ योग्य |
| कफोत्क्लेश सहित | ✅ विशेष योग्य |
| पीनस + घुर्घुरु सहित | ✅ योग्य |
"क्षीणक्षतातिस्थूलातिकृशबालवृद्धदुर्बलश्रान्त- तृषितगर्भिणीसुकुमारदुश्छर्दितेषु न वमयेत्।" (च.क.स्था. १/७)अर्थ: निम्नलिखित व्यक्तियों में वमन नहीं देना चाहिए:
"क्षीणं क्षतं चाऽतिस्थूलं चाऽतिकृशं बालकं तथा। वृद्धं दुर्बलमत्यर्थं श्रान्तं तृषितमेव च। गर्भिणीं सुकुमारं च न वामयेद् भिषक् क्वचित्॥" (च.क.स्था. १/७-८)
| क्र. | व्यक्ति प्रकार | कारण |
|---|---|---|
| १ | क्षीण (अत्यन्त दुर्बल) | बल नहीं झेल सकता |
| २ | क्षत (आन्तरिक चोट/ulcer) | रक्तस्राव का खतरा |
| ३ | अतिस्थूल (अत्यधिक मोटा) | मार्ग अवरोध |
| ४ | अतिकृश (अत्यधिक पतला) | देह बल कम |
| ५ | बाल (छोटा बच्चा) | असहनशीलता |
| ६ | वृद्ध (अति वृद्ध) | अशक्तता |
| ७ | दुर्बल | बल नहीं |
| ८ | श्रान्त (थका हुआ) | अतिरिक्त कष्ट |
| ९ | तृषित (अत्यन्त प्यासा) | जल-मात्रा कम |
| १० | गर्भिणी (गर्भवती) | गर्भपात का खतरा |
| ११ | सुकुमार (नाजुक प्रकृति) | असहनशीलता |
| १२ | दुश्छर्दित (बार-बार उल्टी करने वाला) | स्वतः उल्टी होती है |
"उरःक्षते हृद्रोगे च मूत्राघाते प्लीहगुल्मे च। उदरे शिरःशङ्खाक्षिकर्णशूले न वामयेत्॥" (च.क.स्था. १/९)
| क्र. | रोग | आधुनिक समकक्ष | कारण |
|---|---|---|---|
| १ | उरःक्षत (Chest injury) | Hemothorax / Chest trauma | Valsalva से रक्तस्राव |
| २ | हृद्रोग (Heart disease) | Cardiac conditions | Straining से cardiac stress |
| ३ | मूत्राघात | Urinary obstruction/Anuria | Fluid imbalance |
| ४ | प्लीह (Spleen disorder) | Splenomegaly | Splenic rupture risk |
| ५ | गुल्म (Abdominal lump) | Abdominal mass/tumor | Pressure complications |
| ६ | उदर (Ascites) | Ascites | Pressure increase |
| ७ | शिरःशङ्ख शूल | Migraine/ICP raised | ICP बढ़ने का खतरा |
| ८ | अक्षि शूल | Eye diseases | Intraocular pressure |
| ९ | कर्ण शूल | Ear diseases | Eustachian tube pressure |
"आसेवितास्थापनानुवासनयोः पश्चात् न वामयेत्।" (च.क.स्था. १/१०)अर्थ: आस्थापन और अनुवासन बस्ति दिए जाने के बाद वमन नहीं देना चाहिए।
"वातरोगेषु न वमनं प्रशस्तम्।"अर्थ: वातज रोगों में वमन प्रशस्त नहीं है।
| क्र. | अवस्था | कारण |
|---|---|---|
| १ | नेत्र रोग (Glaucoma) | Intraocular pressure बढ़ने का खतरा |
| २ | अर्श (Bleeding piles) | रक्तस्राव |
| ३ | वात प्रधान रोग | वात का और प्रकोप |
| ४ | अत्यधिक आम | Ama की स्थिति में |
| ५ | बस्ति के बाद | Electrolyte imbalance |
| ६ | प्रमेह (वातज) | दुर्बलता |
| ७ | ग्रीष्म ऋतु | पित्त प्रकोप |
| ८ | संध्याकाल | वायु प्रकोप काल |
"क्षीणदुर्बलगर्भिण्यो बालवृद्धाश्च न वाम्याः। हृद्रोगे चोरसि क्षते विसर्जयेन्न वामनम्॥" (सु.सू. ३३)अर्थ: क्षीण, दुर्बल, गर्भिणी, बाल, वृद्ध - इनमें वमन नहीं देना चाहिए। हृदय रोग और छाती की चोट में भी वमन वर्जित है।
| स्थिति | निर्णय | संहिता संदर्भ |
|---|---|---|
| बलवान् + कफाधिक्य + वेगावस्था | ✅ वमन दें | च.चि. १७/१२०, अ.हृ.चि. ४/१ |
| नवीन तमक + मध्यम बल | ✅ वमन दें | च.चि. १७ |
| मध्यम बल + स्नेहन-स्वेदन के बाद | ✅ मृदु वमन | सु.चि. ३३, अ.हृ.चि. ४ |
| वसन्त ऋतु + कफाधिक्य | ✅ वासन्तिक वमन | च.सू. ६ |
| स्थिति | निर्णय | कारण |
|---|---|---|
| दुर्बल + वाताधिक्य | ❌ वमन नहीं | बृंहण चिकित्सा दें |
| वृद्ध तमक रोगी | ❌ वमन नहीं | शमन चिकित्सा दें |
| Cardiac comorbidity | ❌ वमन नहीं | हृद्रोग contraindicated |
| अवेगावस्था | ❌ वमन नहीं | विरेचन दें |
| बाल तमक | ❌ पूर्ण वमन नहीं | मृदु/आकण्ठ पान |
| उरःक्षत सहित | ❌ वमन नहीं | Chest injury |
| Raised ICP / नेत्र रोग | ❌ वमन नहीं | Pressure बढ़ने का खतरा |
"बलवत्सु कफाधिक्ये कर्शनं तत्र शस्यते। दुर्बलेषु तु बृंहणम् वृद्धेषु शमनं हितम्॥" (अ.हृ.चि. ४/१-३)
तमक श्वास रोगी
↓
बल का आकलन
↓
┌──────────────────────────────────┐
│ बलवान् + कफाधिक्य │ दुर्बल + वात│ वृद्ध │
│ ↓ │ ↓ │ ↓ │
│ शोधन चिकित्सा │ बृंहण │ शमन │
│ (वमन + विरेचन) │ चिकित्सा │ मात्र │
└──────────────────────────────────┘
| Indications | Contraindications | |
|---|---|---|
| रोग | श्वास, कास, हिक्का, पीनस, कुष्ठ, अम्लपित्त, विष, मेदोरोग | हृद्रोग, उरःक्षत, मूत्राघात, प्लीह, गुल्म, उदर, नेत्र-कर्ण शूल |
| व्यक्ति | बलवान्, कफाधिक्य, स्नेहस्विन्न, नवीन रोगी | क्षीण, गर्भिणी, बाल, वृद्ध, दुर्बल, श्रान्त, तृषित, क्षत |
| अवस्था | वेगावस्था, कफोत्क्लेश, उत्क्लिष्ट कफ | बस्ति के बाद, अवेगावस्था, वात प्रधान |
| ऋतु | वसन्त (Vasanta = Best), शरद | ग्रीष्म, वर्षा |
| प्रमुख संदर्भ | च.चि. १७/१२०, च.सू. २५/४० | च.क.स्था. १/७-९, सु.सू. ३३ |
परीक्षा स्मरणीय:
- "तमके मृदु वमनम्" (अ.हृ.) - वाग्भट का सूत्र
- "कासश्वासहिक्कासु वामनं हितम्" (च.चि. १७/१२०) - चरक का निर्देश
- "तमके तु विरेचनम्" (च.चि. १७/१२१) - अवेगावस्था में विरेचन
- वमन = वेगावस्था | विरेचन = अवेगावस्था - यह भेद सर्वाधिक महत्वपूर्ण है