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Present it into tabular format according to acharya in ayurved format in hindi language

नीचे छवि में दिए गए सूतिका रोग — साध्य-असाध्यता के विवरण को विभिन्न आचार्यों के मतानुसार सारणी (Tabular) प्रारूप में प्रस्तुत किया गया है:

सूतिका व्याधि — साध्य-असाध्यता (आचार्यों के मतानुसार)

क्र.सं.आचार्य / ग्रन्थसाध्यता का वर्गीकरणकारण / विशेष कथन
सामान्य सिद्धान्त (सूतिका रोग की प्रकृति)कृच्छ्रसाध्य / असाध्यसूतिका को उत्पन्न सभी व्याधियाँ कृच्छ्रसाध्य या असाध्य होती हैं, क्योंकि गर्भवृद्धि के कारण सभी धातुएँ क्षय-युक्त एवं शिथिल हो जाती हैं तथा प्रवाहण की वेदना और क्लेद-रक्त की निःसृति से शरीर विशेष रूप से शून्य हो जाता है।
आचार्य सुश्रुतकृच्छ्रसाध्य / असाध्यमिथ्याचार से उत्पन्न सूतिका की व्याधियों को कृच्छ्रसाध्य या असाध्य बताया है, क्योंकि वे अत्यधिक अपर्तपण से उत्पन्न होती हैं।
वृद्धवाग्भट (महर्षि चरक के अनुसार)कृच्छ्रसाध्य / असाध्यवृद्धवाग्भट ने महर्षि चरक के मत का अनुसरण करते हुए सूतिका व्याधियों को कृच्छ्रसाध्य या असाध्य बताया है।
अष्टाङ्गहृदयकार (वाग्भट)दुःसाध्यसूतिका की व्याधियों को दुःसाध्य बताया है।
महर्षि काश्यपअसाध्यसूतिका व्याधि की असाध्यता का स्पष्ट वर्णन किया है।
माधवनिदानकष्टसाध्य / दारुण रोगसूतिका के अग्नि, मांस एवं बल के क्षीण होने के कारण उत्पन्न व्याधियों को कष्टसाध्य बताते हुए दारुणरोग भी कहा है।

साध्यता के वर्गों का संक्षिप्त परिचय

वर्गअर्थ
साध्यजो रोग चिकित्सा से ठीक हो सके
कृच्छ्रसाध्यकठिनाई से ठीक होने वाला रोग
दुःसाध्यअत्यन्त कठिनाई से ठीक होने वाला
कष्टसाध्यकष्ट/पीड़ा के साथ साध्य होने वाला
असाध्यजिसे चिकित्सा से ठीक न किया जा सके

सारांश: सभी प्रमुख आचार्यों — सुश्रुत, वाग्भट, चरक, काश्यप एवं माधव — के अनुसार सूतिका रोग साधारणतः कृच्छ्रसाध्य से असाध्य की श्रेणी में आता है, जिसका मूल कारण गर्भावस्था में धातुओं का क्षय, शरीर की शिथिलता एवं अग्नि-बल का ह्रास है।
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