Present it into tabular format according to acharya in ayurved format in hindi language
| क्र.सं. | आचार्य / ग्रन्थ | साध्यता का वर्गीकरण | कारण / विशेष कथन |
|---|---|---|---|
| १ | सामान्य सिद्धान्त (सूतिका रोग की प्रकृति) | कृच्छ्रसाध्य / असाध्य | सूतिका को उत्पन्न सभी व्याधियाँ कृच्छ्रसाध्य या असाध्य होती हैं, क्योंकि गर्भवृद्धि के कारण सभी धातुएँ क्षय-युक्त एवं शिथिल हो जाती हैं तथा प्रवाहण की वेदना और क्लेद-रक्त की निःसृति से शरीर विशेष रूप से शून्य हो जाता है। |
| २ | आचार्य सुश्रुत | कृच्छ्रसाध्य / असाध्य | मिथ्याचार से उत्पन्न सूतिका की व्याधियों को कृच्छ्रसाध्य या असाध्य बताया है, क्योंकि वे अत्यधिक अपर्तपण से उत्पन्न होती हैं। |
| ३ | वृद्धवाग्भट (महर्षि चरक के अनुसार) | कृच्छ्रसाध्य / असाध्य | वृद्धवाग्भट ने महर्षि चरक के मत का अनुसरण करते हुए सूतिका व्याधियों को कृच्छ्रसाध्य या असाध्य बताया है। |
| ४ | अष्टाङ्गहृदयकार (वाग्भट) | दुःसाध्य | सूतिका की व्याधियों को दुःसाध्य बताया है। |
| ५ | महर्षि काश्यप | असाध्य | सूतिका व्याधि की असाध्यता का स्पष्ट वर्णन किया है। |
| ६ | माधवनिदान | कष्टसाध्य / दारुण रोग | सूतिका के अग्नि, मांस एवं बल के क्षीण होने के कारण उत्पन्न व्याधियों को कष्टसाध्य बताते हुए दारुणरोग भी कहा है। |
| वर्ग | अर्थ |
|---|---|
| साध्य | जो रोग चिकित्सा से ठीक हो सके |
| कृच्छ्रसाध्य | कठिनाई से ठीक होने वाला रोग |
| दुःसाध्य | अत्यन्त कठिनाई से ठीक होने वाला |
| कष्टसाध्य | कष्ट/पीड़ा के साथ साध्य होने वाला |
| असाध्य | जिसे चिकित्सा से ठीक न किया जा सके |